Sunday, January 17, 2010

Kya Likhoon....

कल १८ जनवरी है. मेरी शादी को कल ३ साल पुरे हो रहे हैं. अभी थोड़ी देर पहले मैं अपनी पत्नी से पूछ रहा था कि हम दोनों एक साथ अभी खुश हैं या कि शादी के पहले खुश रहा करते थे. उसने कहा कि जवाब तुम्हे मालूम है. हर एक उस पल जब हम दोनों एक दूसरे को समझ नहीं पाए और कहा कि मैं कहाँ आ कर फंस गयी तुम्हारे साथ....तो मैने भी उसका जवाब यही कह कर के दिया कि मैं भी तुम्हे झेल रहा हूँ. पर चाहे जैसे भी हो हम ३ सालों से साथ हैं और आगे भी कम से कम मेरे लिए तो कोई उम्मीद नहीं है. पर एक बात और भी है...अगर अभी आज हम दोनों को आप्शन मिले कि जाओ टेक अ न्यू डिसीज़न...तब भी हम दोनों थक हार के एक दूसरे के ही पास आयेंगे. पिछले ३ सालों में हम दोनों एक दूसरे की कमियों और खूबियों के इतने आदि हो चुके हैं कि औब कहीं और लाइफ spaici नहीं लगती. इंडियन शादिओं कि यह एक बात बड़ी ख़ास है कि आपके आप्शन बड़ी जल्दी ख़तम हो जाते हैं और हम दोनों चाहे जितनी भी अडवांस क्यों न हो मियां और बीवी जैसा न केवल बिहैव करते हैं बल्कि सोचने भी लगते हैं. और एक मियां के अपनी कुछ सर्टेन ख्वाहिशें होती हैं जिन्हे बीवी एस अ rutene पूरा करती है और बीवी के तौर पे उसकी कुछ फरमाइश और खरी खोटी होती है जिसे नॉर्मली मियां बहुत कजुअली लेता है.  हाँ मैं यह बात मानता हूँ कि हम दोनों एक गाडी के दो पहिये हैं...पर गाडी चलेगी तब न जब दोनों पहिये एक ही दिशा में चले नहीं तो गाडी एक जगह पे खड़ी रखने का क्या फायदा है? हमारी गाडी मूव तो करती है पर वापस आकर उसी पार्किंग में खड़ी हो जाती है. पर ३ साल में ज्यादा उम्मीद भी तो नहीं कर सकते न. अगर में मेरी बीवी से चाहूँगा तो मुझे भी देना पड़ेगा न. तो भैया अच्छा है कि स्पीड नोर्मल ही रहने दो. वैसे एक बात है...बीवी के रूप पे मानो आपको एक खाली स्टेज मिल जाता है जहाँ आप कुछ भी अनाप शनाप कहते रहो कोई आपको सड़े अंडे टमाटर या जूते नहीं मारता और आप तसल्ली से अपनी सारी गन्दगी उड़ेल कर हलके हो जाते हैं. हैं न अच्छी बात.अलग अलग जगह से आने और अलग होने के बाद भी जिस तरह से दो रंगों को मिला कर एक नया रंग बनता है उसी तरह से लाइफ एक अजीब से नए रंग में रंग जाती है जिसे आपने पहले कभी नहीं देखा होता है. आपका रंग होता तो है पर बगल में किसी दूसरे शेड के साथ.
तीन सालों में हमने अलग अलग एक दूसरी को क्या दिया या कितना दिया उस पर तो कभी सहमति नहीं बन पायी पर हम दोनों ने मिल एक दूसरे को एक अनमोल गिफ्ट दिया है और वोह है हमारा डेढ़ बरस का बेटा. अब तो अगर हम दोनों में से किसी को चिल्लाना भी होता है तो यह सोच कर चुप रह जाते है कि बेटा कॉपी करेगा .वैसे बेटा सेफ्टी वोल्व का काम करता है. एक दूसरे से गुस्सा हम दोनों उसको देख कर हंस पड़ते हैं...और फिर अपने अपने काम में. यह सच है कि शादी के बाद नया करने कि गुंजाईश कम हो जाती पर लाइफ में ठहराव आ जाता है और हम निश्चिन्त हो जाते हैं कि चलो कम से कम हम अब घर बार वाले हो गए और लाइफ कि बहुत सारी प्राथमिकतायें बदल जाती हैं. मैने उसके हिसाब से खुद को कितना बदला है यह मैं नहीं कह सकता....पर इतना ज़रूर है कि अब घर आकर मैं सेफ फील करता हूँ. मैं मेरे बीवी और बेटे को मिस करता हूँ जब भी वो बहार होते हैं, मुझे उनकी चिंता होती है यह और बात है कि सामने आते ही फिर पहले जैसे हो जाता है.पर ऐसा कोई मेरे साथ ही थोड़ी होता होगा? है न? ऋचा ने खुद को मेरे हिसाब से बहुत बदला है और मेरी पसंद कि चीजों को करने कि कोशिश भी की है..अब अभी करती है....मैं बहुत क्रिटिकल हूँ और उसको हर बात में तारीफ़ चाहिए....एक मान के रूप में , एक कम्पनिओन के रूप में और अब एक पत्नी के रूप में भी उसने धीरे धीरे अपनी जगह  पक्की कर ली है.....

Friday, January 15, 2010

Kab ke bichhde...

एक ख़त तुम्हारे नाम. सुमति.यार जब तुम  लिखते हो तुम पर बड़ा प्यार आता है. यह बूँद बूँद कर के प्यास मत बुझाया करो   ...दरिया उड़ेल दो....पर ध्यान रखना ..सुना है कि अगर कोई बहुत दिनों का प्यासा हो तो उसकी प्यास भी तड़पा तड़पा कर के ही बुझानी चाहिए...ऐसा है क्या? पर मैं क्या करूँ..मैं तो पूरा दरिया ही हलक में उतारना चाहता हूँ. मय कि तुमको ज़रूरत नहीं पड़ती और हम हैं कि मयखाने में ही अपनी मय्यत का इंतज़ाम देखना चाहते हैं.सुन यार देख....यह नशा जो है न कुछ पलों के लिए ही सही मुझे तुझसे मिला तो देता है न...फिर मैं इसे बुरा कैसे कह सकता हूँ. मेरी जान...तुझे याद है जब हम दोनों वक़्त के हिचकोलों पर सवार थे और एक ही स्टेशन पर उतरना चाह था..पर तू पहले उतर गया और मैं बाद में गाडी छोड़ पाया...और तब के छूते तो अब तक सफ़र तमाम कर रहे हैं. क्या बेकारी के दिन अच्छे थे? पता नहीं सच सच नहीं कह सकता. रोटी बाकि सब बातों पर इतनी भारी  पड़ गयी है कि और कुछ देखना नहीं चाहता.फिर अब मेरे दिल में भी तो न जाने कौन कौन मर्ज़ी या बेमर्ज़ी के घर कर गया है न? अब ख्याल तो रखना ही पड़ेगा न. मेहमान जो ठहरे .अच्छा सुन....
बंद कर के कभी आँखों को ख्वाब देखा है?
वो रंग स्याह है या सुर्ख कभी देखा है?
कि वक़्त पानियों पे अक्स जो बनाता है..
उसे उतार के काग़ज़ पे कभी देखा है?

कभी देखना ..पता चलेगा कि वक़्त ने काग़ज़ के साथ क्या किया है?

पतंग बन के हवाओं के घर गए हो कभी?
ख्याल बन के मेरी सोच में ढले हो कभी?
कि तुमको याद कभी आती है वो फांकाकशी?
किसी कि हसरतों के वास्ते रुके हो कभी?

कैसे रुकोगो? रुक जाने का नाम तो ज़िन्दगी नहीं है न? पर...

हम अगर थाम ले बाहें कभी और यूँ पूछे...
बताओ आज ...हमें कितना प्यार करते हो?
रुकोगो , सांस भर के सोचोगे  ..
और कहोगे कि कैसा सवाल पूछा है?

ऐसा कई बार होता है जब हम यह सोच कर कुछ नहीं कहते कि कहना क्या है...तुम्हे तो पता ही है न? कैसे पता होगा? अब तू तुम्हारी परछाईं भी मेरे साथ नहीं चलती...कमबख्त ने तुम्हारा बाजु थाम लिया है...
मिलते रहो.. बिखरते रहो और मुझ पर यूँ ही बरसते रहो....

Thursday, January 14, 2010

O' My Kanpur

Hi guys.............I am back after a long gap. The life took a U turn in the last 4 months. I shifted to a new city and now trying to adjust here, or should I say that the new city is demanding it. I miss my life in Kanpur. It really happened a lot over that last one year. Colorful evenings, great wines, cool places, wonderful company and a posting of lifetime. You know that it is your circle which makes you miss the place. The new city is also on the bank of river Ganga. This is my third district of posting, on the bank of Ganga.Varanasi was the first in U.P.I forget to shape my thoughts in the last few months and poetry................uummmm...lemme think...O common...only few years. Okie....I understand. Will try to be regular with a variety of topics to share with you.Take care.