Saturday, February 13, 2010
Thoda Antraal...
दोस्तों मैं कुछ समय के लिए बाहर जा रहा हूँ. इस बीच हो सकता है कि कुछ शेयर न कर पाऊँ. जल्दी ही लौटूगा...और फिर होगी ढेर सारी बातें.
Pata nahin yeh kya hai......?
जब मैं कॉलेज में था उस समय कि बकवास है......आज ऑफिस में सफाई करते समय पुराने कागजों में मिला...सोच कि लिख दूं ताकि सेफ रहे....१९९२
नारी मैं तुम्हे वृत्त मानता हूँ.एक ऐसा वृत्त जिसकी त्रिज्या अस्पष्ट है,तुम्हारे व्यवहार की तरह और जो गज भर लम्बी है तुम्हारी जुबान की तरह.इस वृत्त की परिधि मात्र एक न होकर तमाम संकेंद्रित परिधियों का समूह है .यह परिधियाँ जो सूचक है सामान्य नारी व्यवहार के यथा....लोभ,प्रपंच,मिथ्या भाषण,मोहिनी,छल,अप्व्ययिता,कपट,विद्वेष और नाना प्रकार के गुण धर्म.पर एक बात इस वृत्त के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है , जिस प्रकार कोई बच्चा गोला प्रकार से वृत्त खींचते समय प्रकार की नोक को काग़ज़ पे ज्यादा ही घुसा देता है उसी प्रकार विधाता ने भी नारी व्यव्हार वृत्त की रचना में केंद्र पर आवर्तों एवं परिधिओं की अपेक्षा अधिक श्रम और ध्यान दिया है.
अभी और भी है..........
नारी मैं तुम्हे वृत्त मानता हूँ.एक ऐसा वृत्त जिसकी त्रिज्या अस्पष्ट है,तुम्हारे व्यवहार की तरह और जो गज भर लम्बी है तुम्हारी जुबान की तरह.इस वृत्त की परिधि मात्र एक न होकर तमाम संकेंद्रित परिधियों का समूह है .यह परिधियाँ जो सूचक है सामान्य नारी व्यवहार के यथा....लोभ,प्रपंच,मिथ्या भाषण,मोहिनी,छल,अप्व्ययिता,कपट,विद्वेष और नाना प्रकार के गुण धर्म.पर एक बात इस वृत्त के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है , जिस प्रकार कोई बच्चा गोला प्रकार से वृत्त खींचते समय प्रकार की नोक को काग़ज़ पे ज्यादा ही घुसा देता है उसी प्रकार विधाता ने भी नारी व्यव्हार वृत्त की रचना में केंद्र पर आवर्तों एवं परिधिओं की अपेक्षा अधिक श्रम और ध्यान दिया है.
अभी और भी है..........
Friday, February 12, 2010
Tumhara likha...
समीर, तुम्हारा ख़ूबसूरत सा कार्ड ढेर सारे प्यार को आग़ोश में समेटे हुए मेरे दरवाज़े पे आ खड़ा हुआ और तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा मेरी नज़रों में घूम गया.पता नहीं क्यों फ़ोन से कारगर ये कलम लगी और मैंने उठा ली....
"एक काग़ज़ ने तय किया रिश्ते का सफ़र,
फिर भी तनहा हूँ तुझसे बिछड़ जाने के बाद"
बस कुछ ख्याल उतरा रहे हैं. लिख दूं. और भरम नहीं यकीं पालूंगा कि लिखे को उतनी शिद्दत से समझोगे जितनी तड़प से लिखने वाला लिख रहा है.
इन दिनों कभी यह भी महसूस करते होगे कि तसल्ली और सकूँ ही सब कुछ नहीं.उस आवारगी में भी कुछ था जो शिकश्त के थपेड़ों से जन्मी थी.
"जब कभी माझी पे निगाह जाती है,
अपनी वोह बिखरी हुई दुनिया नज़र आती है,
याद आते हैं ज्यूँ अपनी शिकस्तों के पल,
तब कामयाबी पे मेरी आँख डबडबाती है"
उस आरामगाही हो हर कोई तलाशता है जिसको तुम पा सके हो. पर कब तक सकूँ कि चादर रास आती है?जहन में, बदन में,दिल में,जिगर में तो वही आवारगी बसी है.हो सके जब तक खाली हो कुछ लिख डालो, कुछ बुन डालो,एक अलग राह कि सैर .मैं तुम्हारी कलम पर पकड़ का कायल हूँ.और इसलिए अर्ज़ करूँगा कि कुछ लिख कर भेजो. और तय करने दो कागजों को रिश्तों का सफ़र .तुम्हारे ख़त के इंतज़ार में......
अज़ीज़.
"सुमति यह तुम्हारा लिखा हुआ ख़त है......ज्यों का त्यों ..देखो मैने कैसा सहेज कर रखा है......
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