जब मैं कॉलेज में था उस समय कि बकवास है......आज ऑफिस में सफाई करते समय पुराने कागजों में मिला...सोच कि लिख दूं ताकि सेफ रहे....१९९२
नारी मैं तुम्हे वृत्त मानता हूँ.एक ऐसा वृत्त जिसकी त्रिज्या अस्पष्ट है,तुम्हारे व्यवहार की तरह और जो गज भर लम्बी है तुम्हारी जुबान की तरह.इस वृत्त की परिधि मात्र एक न होकर तमाम संकेंद्रित परिधियों का समूह है .यह परिधियाँ जो सूचक है सामान्य नारी व्यवहार के यथा....लोभ,प्रपंच,मिथ्या भाषण,मोहिनी,छल,अप्व्ययिता,कपट,विद्वेष और नाना प्रकार के गुण धर्म.पर एक बात इस वृत्त के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है , जिस प्रकार कोई बच्चा गोला प्रकार से वृत्त खींचते समय प्रकार की नोक को काग़ज़ पे ज्यादा ही घुसा देता है उसी प्रकार विधाता ने भी नारी व्यव्हार वृत्त की रचना में केंद्र पर आवर्तों एवं परिधिओं की अपेक्षा अधिक श्रम और ध्यान दिया है.
अभी और भी है..........
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