Sunday, November 28, 2010
colours
रंगों की दुनिया में नया नहीं हूँ..........बस कुछ समय के लिए हाथ में कूची कि जगह कलम आ गयी थी. फिर से गोते लगाने को तैयार हूँ..................लाल, हरे, नीले समंदर में..............मैं अपनी सब पेंटिंग पोस्ट करूँगा..........अभी हाथ पक्का करना है........पर....ओके...
Thursday, November 4, 2010
LOLITA EFFECT
मेरी पत्नी को लगता है कि मैं लम्पट हो गया हूँ. वोह मुझे बार बार याद दिलाती हैं कि मेरी शादी को ४ साल हो गए हैं और मैं एक बच्चे का पिता हूँ. इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता कि मैंने किसी सोशल नेट वर्किंग साईट पर अपनी उम्र नहीं लिखी है. वोह मुझ पर फब्तियां कसने लगती है जब मैं अपने स्थूल उदर के फ्लैट टायरों को अन्दर खींचने कि कोशिश करता हूँ. मुझे ऐसा लगता है कि मैं बड़े तेजी से बूढ़ा हो रहा हूँ और मेरी बीवी शायद चाहती है कि यह काम जल्दी हो जाये ताकि वोह सेफ हो जाए.यार मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि मैं इतनी जल्दी बड़ा हो जाऊंगा. अपने दिल के साथ जिस्म का कदम ताल गड़बड़ा रहा है. और दिल आज कल ऐसी हसरतें पाल बैठा है कि नुमायाँ होते ही जिस्म को बेहिसाब जूते पड़ेंगे. वैसे जूते मारने वाले लोगों में भी हम जैसे ही सुरमा होते हैं जो किसी और कि ख्वाहिश को इस उम्र में पूरा होते देख नहीं सकते.
मुझे आज कल दूर दर्शन कि न्यूज़ रिपोर्टर भी खूब सूरत लगने लगी हैं. जींस को मुझे लगता है कि लड़कियों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए क्योंकि इस पोशाक को पहनने से उनमे अपने जिस्म को तराशने और उसे शेप में रखने कि ललक पैदा होती है ...तो एक तरह से जींस स्वस्थ भारत का निर्माण कर रही है....और आँखों को अगर ऐसा कुछ रोज़ देखने को मिल जाए तो साइनेरिया मेरिटिमा सक्कस को खरीदने कि क्या ज़रूरत है? ....देखा आपने बुढ़ापे में मोतिया बिन्द का खतरा कम...और दिन बा दिन जवान होते जा रहे इस देश के करीब आने मौका मिलेगा सो अलग.
कई बार हम देखते हैं कि कोलेज के टीचर ज्यादा फिट और जवान दीखते है ...शरीर से और मन से भी. भाई क्यों न हो रोज़ रोज़ नयी नयी शिष्याओं को पाठ पढ़ाने का मौका जो मिलता है. और एक हम है जो अपनी जवानी नाली चक रोड के झमेलों में गर्क कर रहे हैं. आज कल किसी चैट साईट पर बैठता हूँ तो लगता है कि जैसे बात करने को कुछ नहीं है...नए नए शब्द नए नए विचार और नए नए तरीके छा गए हैं दोस्त बनाने के. मन मार के लाग आउट करना पड़ता है. दुनिया खूबसूरत होती जा रही है. मुझे तो कोई बदसूरत दीखता ही नहीं. शाम को जानी वाकर या ब्लैक डॉग साथ होते है और उस समय लगता है कि वियाग्रा का मूल तत्त्व कहीं हमारे अन्दर ही भरा पड़ा है. Adrinalin का रिसाव तेज़ हो जाता है और कुछ बेवक़ूफ़ बहादुर बगल के घरों कि नीची दीवार को फलांग जाते हैं.
मेरी बीवी कमर पे हाथ रख कर के घूर रही है..................शट डाउन करना पड़ेगा.....
हाँ श्रीमती जी बताइये ..क्या सेवा करूँ आपकी? नहीं....नहीं ..मैने दुर्गा शप्तशती का पाठ कर लिया था सुबह....
मुझे आज कल दूर दर्शन कि न्यूज़ रिपोर्टर भी खूब सूरत लगने लगी हैं. जींस को मुझे लगता है कि लड़कियों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए क्योंकि इस पोशाक को पहनने से उनमे अपने जिस्म को तराशने और उसे शेप में रखने कि ललक पैदा होती है ...तो एक तरह से जींस स्वस्थ भारत का निर्माण कर रही है....और आँखों को अगर ऐसा कुछ रोज़ देखने को मिल जाए तो साइनेरिया मेरिटिमा सक्कस को खरीदने कि क्या ज़रूरत है? ....देखा आपने बुढ़ापे में मोतिया बिन्द का खतरा कम...और दिन बा दिन जवान होते जा रहे इस देश के करीब आने मौका मिलेगा सो अलग.
कई बार हम देखते हैं कि कोलेज के टीचर ज्यादा फिट और जवान दीखते है ...शरीर से और मन से भी. भाई क्यों न हो रोज़ रोज़ नयी नयी शिष्याओं को पाठ पढ़ाने का मौका जो मिलता है. और एक हम है जो अपनी जवानी नाली चक रोड के झमेलों में गर्क कर रहे हैं. आज कल किसी चैट साईट पर बैठता हूँ तो लगता है कि जैसे बात करने को कुछ नहीं है...नए नए शब्द नए नए विचार और नए नए तरीके छा गए हैं दोस्त बनाने के. मन मार के लाग आउट करना पड़ता है. दुनिया खूबसूरत होती जा रही है. मुझे तो कोई बदसूरत दीखता ही नहीं. शाम को जानी वाकर या ब्लैक डॉग साथ होते है और उस समय लगता है कि वियाग्रा का मूल तत्त्व कहीं हमारे अन्दर ही भरा पड़ा है. Adrinalin का रिसाव तेज़ हो जाता है और कुछ बेवक़ूफ़ बहादुर बगल के घरों कि नीची दीवार को फलांग जाते हैं.
मेरी बीवी कमर पे हाथ रख कर के घूर रही है..................शट डाउन करना पड़ेगा.....
हाँ श्रीमती जी बताइये ..क्या सेवा करूँ आपकी? नहीं....नहीं ..मैने दुर्गा शप्तशती का पाठ कर लिया था सुबह....
ITNE RAAM KAHAN SE LAAUN?
घर घर रावण , हर घर लंका , कैसे मैं इस तम को मिटाऊं ,
कलयुग की इस रामायण में इतने राम कहाँ से लाऊं ?
सीता अब भी अर्ध नग्न है,रावण अब भी है अपहर्ता ,
जनक नंदिनी अन्वेषण , को हनुमत शक्ति कहाँ से पाऊं ?
राम तुम्हारे कारण देखो ,न्यायालय में युद्ध छिड़ा है,
जीत तुम्हारी हो रघुराई , ऐसा न्यायी किसे बनाऊं ?
कोई इन्द्र नहीं सम्मुख है,युद्ध कहाँ है हे रघुनन्दन ,
किस कारण दधीचि प्रेरित हो, मैं अपनी अस्थियाँ गलाऊं ?
क्या पाया तुमने वन जा कर, यश , पत्नी या संतति सेवा,
क्यों तुमको आदर्श बना कर, मैं तुम जैसा ही दुःख पाऊं?
तुम लौटे बनवास बिता कर ,अवध पुरी ने दीप जलाये,
वैदेही की अग्नि परीक्षा, के छालों को किसे दिखाऊं?
नहीं अनुज लक्षमण सा मिलता ,नहीं भरत सा कोई भाई ,
नहीं तात जब दशरथ जैसा, कुल मर्यादा यश क्या गाऊं ?
जग दीवाली मना रहा है, राम तुम्हारे घर आने पर,
मेरा भी मन है एक दीपक ,राम तुम्हारे साथ जलाऊं .
कलयुग की इस रामायण में इतने राम कहाँ से लाऊं ?
सीता अब भी अर्ध नग्न है,रावण अब भी है अपहर्ता ,
जनक नंदिनी अन्वेषण , को हनुमत शक्ति कहाँ से पाऊं ?
राम तुम्हारे कारण देखो ,न्यायालय में युद्ध छिड़ा है,
जीत तुम्हारी हो रघुराई , ऐसा न्यायी किसे बनाऊं ?
कोई इन्द्र नहीं सम्मुख है,युद्ध कहाँ है हे रघुनन्दन ,
किस कारण दधीचि प्रेरित हो, मैं अपनी अस्थियाँ गलाऊं ?
क्या पाया तुमने वन जा कर, यश , पत्नी या संतति सेवा,
क्यों तुमको आदर्श बना कर, मैं तुम जैसा ही दुःख पाऊं?
तुम लौटे बनवास बिता कर ,अवध पुरी ने दीप जलाये,
वैदेही की अग्नि परीक्षा, के छालों को किसे दिखाऊं?
नहीं अनुज लक्षमण सा मिलता ,नहीं भरत सा कोई भाई ,
नहीं तात जब दशरथ जैसा, कुल मर्यादा यश क्या गाऊं ?
जग दीवाली मना रहा है, राम तुम्हारे घर आने पर,
मेरा भी मन है एक दीपक ,राम तुम्हारे साथ जलाऊं .
Saturday, October 2, 2010
तो क्या इस साल दिवाली जल्दी आ गयी है? क्या कहा? अभी नहीं? अरे ज़रा आवाज़ दबा के बोलिए. कहीं इस देश कि महिलाओं ने सुन लिया तो रंजना कुमारी,मधु किश्वर,वृंदा करात,सुषमा स्वराज,जया प्रदा , अम्बिका सोनी से खूब पिटाई लग्वायेंगी.बाद में सोनिया गाँधी आ कर अगर आपके पजामे के नाड़े में पटाका लगा दे तो फिर मत कहियेगा. अपना कैलेंडर ज्ञान सुधारिए. दिवाली आ गयी गई. इस देश कि आधी आबादी कि दिवाली ९ मार्च को राज्य सभा में महिला आरक्षण बिल पारित होने के साथ ही आ गयी गई है. पर क्या लक्ष्मी पूजन का समय भी निश्चित हो गया है? हाँ ...हां..ठीक है , अभी नहीं हुआ है पर हो जायेगा,
पता नहीं मुस्लिम , दलित और पिछड़ी औरतों का क्या होगा पर इतना तो तय है कि कम से कम कोई कमाल अख्तर,राजनीति प्रसाद वगैरह उनके हाल को पूछने नहीं जायेंगे. उनका काम गिलास तोड़ कर के ही ख़तम हो गया है गोया कि कांच के बने थे सारे नियम कायदे जो टूट गए और हमारी बेहयाई सारी कौम ने देख ली. अक्सर मेरे पास मेरे दफ्तर में कई औरतें शिकायत ले के आती हैं कि उनका मर्द बहुत शराब पीता है और पता नहीं शराब में कौन से दवा मिला लेता है कि पीते ही उसकी मर्दानगी जाग जाती है और वोह मुझे डब्लू डब्लू ऍफ़ का प्रतिद्वंदी पहलवान समझ कर पीटने लगता है. गावं के ही खिलाडी,बच्चा राम,मैकू आदि ने उसकी मति भ्रस्ट कर दी है. मेरे पास भी उनकी इस कुश्ती का कोई तोड़ नहीं होता. पति को छोड़ा नहीं जा सकता और सुधारना तो उससे भी बड़ा मुश्किल काम है. तो क्यों न पति को वहीँ छोड़ कर महिलाएं ही आगे बढ़ जाए. पति और पुरुष अपने आप पीछे आयेंगे.
पता नहीं मुस्लिम , दलित और पिछड़ी औरतों का क्या होगा पर इतना तो तय है कि कम से कम कोई कमाल अख्तर,राजनीति प्रसाद वगैरह उनके हाल को पूछने नहीं जायेंगे. उनका काम गिलास तोड़ कर के ही ख़तम हो गया है गोया कि कांच के बने थे सारे नियम कायदे जो टूट गए और हमारी बेहयाई सारी कौम ने देख ली. अक्सर मेरे पास मेरे दफ्तर में कई औरतें शिकायत ले के आती हैं कि उनका मर्द बहुत शराब पीता है और पता नहीं शराब में कौन से दवा मिला लेता है कि पीते ही उसकी मर्दानगी जाग जाती है और वोह मुझे डब्लू डब्लू ऍफ़ का प्रतिद्वंदी पहलवान समझ कर पीटने लगता है. गावं के ही खिलाडी,बच्चा राम,मैकू आदि ने उसकी मति भ्रस्ट कर दी है. मेरे पास भी उनकी इस कुश्ती का कोई तोड़ नहीं होता. पति को छोड़ा नहीं जा सकता और सुधारना तो उससे भी बड़ा मुश्किल काम है. तो क्यों न पति को वहीँ छोड़ कर महिलाएं ही आगे बढ़ जाए. पति और पुरुष अपने आप पीछे आयेंगे.
Friday, October 1, 2010
KAHO RAAM
कहो राम....
तुमको अपनी सफाई में कुछ कहना है? न्यायालय एक एक कोने में सर झुकाए खड़े दशरथ नंदन राम से एक जज ने पूछा. राम चुप रहे. देखो राम तुम्हारी ख़ामोशी को तुम्हारा इकबाल ए जुर्म माना जा सकता है. तुम्हारे खिलाफ गंभीर आरोप हैं जो किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारे अपने ही देश के लोगों ने लगाये हैं. राम कि आँखों के कोने भीग गए. पैर के नाख़ून से फर्श को कुरेदते हुए राम बेबस से खड़े रहे. आज उनके साथ कोई खड़ा नहीं दिख रहा है. कोई उनके साथ १४ सेकंड का भी बनवास भोगने को तैयार नहीं है. राम क्या तुम ५ साल के लिए राज गद्दी दिला सकते हो ? बोलो ? जज ने फिर पूछा.
राम पर आरोप है कि उन्होंने अपने लिए अपनी ही जन्म भूमि में जगह मांगने का साहस किया. देश का ६० साल बर्बाद किया. २ लाख सिपाहिओं को बेवजह परेशान किया. क्यों....क्यों किया राम? क्या लोगों कि आस्था में तुम्हारा स्थान कम हो गया था या फिर तुम्हे भी अपने लिए प्रोपर्टी चाहिए? क्या हर एक हृदय में जहां तुम सालों से रहते आये हो ....घुटन होने लगी ?
राम कैसे कहे...जहां तो उन्होंने तब भी नहीं जब पित्र चरण ने उन्हें वनवास दिया....कहा तो तब भी नहीं जब समुद्र ने उन्हें स्थान नहीं दिया....और कहा तो तब भी नहीं जब लोक चार ने सीता कि अग्नि परीक्षा मांगी. राम तुम्हारे न बोलने के कारण देखो कितने सारे लोग राम बन कर बोल रहे हैं.आज अगर तुम नहीं बोले तो .......सरयू भी अपना जल समेट कर पाताल गामिनी हो जाएगी....सीता रसोई का चूल्हा सदा सदा के लिए ठंडा पड़ जाएगा...राम चबूतरा दरक जाएगा....और फट जाएगा हनुमान का सीना जहां से इस बार तुम्हारी छवि नहीं केवल और केवल रक्त बहेगा....
राम ने गहरी श्वाश ली....अपने चारो तरफ देखा.....११५ करोड़ की अदालत के बाहर खड़ी भीड़ में अपने लिए ११५ भक्त खोजने की निरर्थक चेष्टा की.....और फिर धनुर्धारी राम ने जिनका धनुष धारा १४४लागू होने के कारन थानेदार ने जमा करा लिया था........और कहा...
मैं शुन्य ने उपजा हुआ साकार ब्रह्मा हूँ. मैं ॐ से ओम्कारित स्पंद हूँ....मैं शाश्वत हूँ...चिरंतन हूँ...मैं श्रेष्ठ हूँ..पूज्य हूँ...और मेरा पता अयोध्या है...वही अयोध्या जज साहब जहां कभी युद्ध नहीं होता. अब भी नहीं होगा....और कभी नहीं होगा....
अवध पुरी की वीथिकाओं में ........इसका मतलब गली होता है.....जज साहब ने बयान लिखने वाले क्लार्क को टोका...हाँ राम आगे बोलो...
जहां मेरा बचपन बीता कभी लगा ही नहीं की मैं अयोध्या के किसी एक कोने में पैदा हुआ था....सारी अयोध्या मेरा पालना थी....सरयू मेरा सिरहाना थी , अयोध्या की हर माँ मेरी माँ थी, हर घर मेरा राज महल था हर होर मेरा सखा थे...जज साहब मैं अयोध्या में नहीं अयोध्या मुझमे रहती थी...अब अयोध्या मेरा दंड कारान्य हो गयी है........सरयू में पांव धोने जाता हूँ..तो धारा पीछे चली जाती है.....और अगर मैं फिर भी नहीं मानता तो पानी लाल हो जाता है....अपने बदन को देखता हूँ...रावण के दिए हुए घावों से फिर से रक्त रिसने लगता है....मेरा कौशेय विदीर्ण हो गया है...मेरी पादुकाएं मेरे मंदिर के बाहर से कोई चुरा ले गया है....और मेरा धनुष अब मुझसे उठाया नहीं जाता.. यह मेरी अयोध्या नहीं लगती जज साहब...यह मेरी अयोध्या नहीं है...नहीं है....मुझे नहीं चाहिए जमीन....मुझ पर लगाया गया इलज़ाम झूठा है...
हो सकता है राम ....तुम सच कह रहे हो.....जज ने कहा....पर तुम्हारे पक्ष में सारे सबूत हैं...और तुम चाहो या न चाहो यह अदालत हुकम देती है कि दशरथ नंदन राम को जहां पर वह विराजमान हैं उसी जगह पर आजीवन बनवास भोगना पड़ेगा....
पक्षकार चाहे तो राम के बनवास कि जगह घटाने या बढाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.....पर राम..........आप कहीं नहीं जा सकते....
आदेश कि ५०० प्रतिया मीडिया में बाँट दी जाए और इसे इंटर नेट पर भी अपलोड कर दिया जाए.
हे राम
तुमको अपनी सफाई में कुछ कहना है? न्यायालय एक एक कोने में सर झुकाए खड़े दशरथ नंदन राम से एक जज ने पूछा. राम चुप रहे. देखो राम तुम्हारी ख़ामोशी को तुम्हारा इकबाल ए जुर्म माना जा सकता है. तुम्हारे खिलाफ गंभीर आरोप हैं जो किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारे अपने ही देश के लोगों ने लगाये हैं. राम कि आँखों के कोने भीग गए. पैर के नाख़ून से फर्श को कुरेदते हुए राम बेबस से खड़े रहे. आज उनके साथ कोई खड़ा नहीं दिख रहा है. कोई उनके साथ १४ सेकंड का भी बनवास भोगने को तैयार नहीं है. राम क्या तुम ५ साल के लिए राज गद्दी दिला सकते हो ? बोलो ? जज ने फिर पूछा.
राम पर आरोप है कि उन्होंने अपने लिए अपनी ही जन्म भूमि में जगह मांगने का साहस किया. देश का ६० साल बर्बाद किया. २ लाख सिपाहिओं को बेवजह परेशान किया. क्यों....क्यों किया राम? क्या लोगों कि आस्था में तुम्हारा स्थान कम हो गया था या फिर तुम्हे भी अपने लिए प्रोपर्टी चाहिए? क्या हर एक हृदय में जहां तुम सालों से रहते आये हो ....घुटन होने लगी ?
राम कैसे कहे...जहां तो उन्होंने तब भी नहीं जब पित्र चरण ने उन्हें वनवास दिया....कहा तो तब भी नहीं जब समुद्र ने उन्हें स्थान नहीं दिया....और कहा तो तब भी नहीं जब लोक चार ने सीता कि अग्नि परीक्षा मांगी. राम तुम्हारे न बोलने के कारण देखो कितने सारे लोग राम बन कर बोल रहे हैं.आज अगर तुम नहीं बोले तो .......सरयू भी अपना जल समेट कर पाताल गामिनी हो जाएगी....सीता रसोई का चूल्हा सदा सदा के लिए ठंडा पड़ जाएगा...राम चबूतरा दरक जाएगा....और फट जाएगा हनुमान का सीना जहां से इस बार तुम्हारी छवि नहीं केवल और केवल रक्त बहेगा....
राम ने गहरी श्वाश ली....अपने चारो तरफ देखा.....११५ करोड़ की अदालत के बाहर खड़ी भीड़ में अपने लिए ११५ भक्त खोजने की निरर्थक चेष्टा की.....और फिर धनुर्धारी राम ने जिनका धनुष धारा १४४लागू होने के कारन थानेदार ने जमा करा लिया था........और कहा...
मैं शुन्य ने उपजा हुआ साकार ब्रह्मा हूँ. मैं ॐ से ओम्कारित स्पंद हूँ....मैं शाश्वत हूँ...चिरंतन हूँ...मैं श्रेष्ठ हूँ..पूज्य हूँ...और मेरा पता अयोध्या है...वही अयोध्या जज साहब जहां कभी युद्ध नहीं होता. अब भी नहीं होगा....और कभी नहीं होगा....
अवध पुरी की वीथिकाओं में ........इसका मतलब गली होता है.....जज साहब ने बयान लिखने वाले क्लार्क को टोका...हाँ राम आगे बोलो...
जहां मेरा बचपन बीता कभी लगा ही नहीं की मैं अयोध्या के किसी एक कोने में पैदा हुआ था....सारी अयोध्या मेरा पालना थी....सरयू मेरा सिरहाना थी , अयोध्या की हर माँ मेरी माँ थी, हर घर मेरा राज महल था हर होर मेरा सखा थे...जज साहब मैं अयोध्या में नहीं अयोध्या मुझमे रहती थी...अब अयोध्या मेरा दंड कारान्य हो गयी है........सरयू में पांव धोने जाता हूँ..तो धारा पीछे चली जाती है.....और अगर मैं फिर भी नहीं मानता तो पानी लाल हो जाता है....अपने बदन को देखता हूँ...रावण के दिए हुए घावों से फिर से रक्त रिसने लगता है....मेरा कौशेय विदीर्ण हो गया है...मेरी पादुकाएं मेरे मंदिर के बाहर से कोई चुरा ले गया है....और मेरा धनुष अब मुझसे उठाया नहीं जाता.. यह मेरी अयोध्या नहीं लगती जज साहब...यह मेरी अयोध्या नहीं है...नहीं है....मुझे नहीं चाहिए जमीन....मुझ पर लगाया गया इलज़ाम झूठा है...
हो सकता है राम ....तुम सच कह रहे हो.....जज ने कहा....पर तुम्हारे पक्ष में सारे सबूत हैं...और तुम चाहो या न चाहो यह अदालत हुकम देती है कि दशरथ नंदन राम को जहां पर वह विराजमान हैं उसी जगह पर आजीवन बनवास भोगना पड़ेगा....
पक्षकार चाहे तो राम के बनवास कि जगह घटाने या बढाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.....पर राम..........आप कहीं नहीं जा सकते....
आदेश कि ५०० प्रतिया मीडिया में बाँट दी जाए और इसे इंटर नेट पर भी अपलोड कर दिया जाए.
हे राम
Wednesday, September 29, 2010
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों कि पांच साला नौटंकी चालू हो गयी है. ढोल नगाड़े सब बज रहे हैं और बेचारे एस डी एम् साहब माइक पकड़ कर जनता को समझा रहे हैं कि देखो भाई कुछ गड़ बड़ मत करना. सूची बन गयी है.वारंट निकल गया है . कोई बचने नहीं पायेगा . माथे से पसीना बह कर कान के पीछे वाले गलियारे से होता हुआ बनियान में कहीं वांटेड और इनामिया कि तरह गुम हो गया है. आरक्षण बदल गया है भैया. बाबू साहब की परधानी के दिन गए. अब तो रामेसरा परधान बनेगा. सुना है पिछले वाले परधान ने मनरेगा और मिड डे मील में बड़ी मलाई काटी है. सब सरकारी धन कि लुटाई है भैया नहीं तो एक दिन में भला परधानी १५०० पर्चे थोड़े ही दाखिल हो जाते. बाबू साहब कि पीड़ा खाली इतनी भर नहीं है. कई जगह तो इस आरक्षण ने बाबू साहब लोगों कि पैंट ढीली करके साडी में बदल दी है. रात में आजकल लुगाई का पैर दबाते हुए दुर्योधन सिंह चम्पावती को सब उंच नीच समझा रहे है. देखना परचा ठीक काउंटर पर ही जमा करना. और साडी वोह नयी वाली ही डालना जो मैं छपरा से लाया था. चम्पावती आँख बंद कर के सुन रही थी. कितना लम्बा घूँघट डालना है जी? अरे यह भी कोई पूछने कि बात है? परधानी लड़ने का मतलब यह थोड़े ही है कि औरत अपनी मान मर्यादा त्याग दे...........सुनो......दुर्जन कि अम्मा ..हम हैं बाद में सब सँभालने के लिए. अरे तुम कहे चिंता करती हो........हम सब संभाल लेंगे......तुमको कुछ नहीं करना पड़ेगा.....या ऐसा कहो कि कुछ करने नहीं दोगे. चम्पावती बुदबुदाई .बस एक ही चिंता है. इस बार डी एम् पार्टी का खर्चा बहुत बढ़ गया है. ई का है जी? अरे डी एम् पार्टी मतलब....दारु मुर्गा पार्टी. साले कहते हैं...चाय समोसा कच्चा बा....दारू मुर्गा पक्का बा.
एस डी एम् बैरिया फ्रॉम कण्ट्रोल....कैरी ऑन....जय हिंद सर.शाम को ४ बजे से फ्लैग मार्च निकलना है सर. ठीक है नोट किया. सर में दर्द हो रहा है. आगे ट्रक वाले ने रास्ता जाम कर रखा है.मुश्किल है. यह फ्लैग मार्च अयोध्या के लिए है. पब्लिक भी सब समझती है और चम्पावती भी. सी ओ साहब साथ में है...शेर सुनेगे? जिन नारी छाया पड़े अंधे होत भुजंग...कबीरा उनकी क्या गति. जो नित नारी के संग....पेट से उबल कर हंसी होंठों पर बुल बुले छोड़ने लगी........गोली मारिये भाई साहब...मसाला खिलाइए....सादा है न?
एस डी एम् बैरिया फ्रॉम कण्ट्रोल....कैरी ऑन....जय हिंद सर.शाम को ४ बजे से फ्लैग मार्च निकलना है सर. ठीक है नोट किया. सर में दर्द हो रहा है. आगे ट्रक वाले ने रास्ता जाम कर रखा है.मुश्किल है. यह फ्लैग मार्च अयोध्या के लिए है. पब्लिक भी सब समझती है और चम्पावती भी. सी ओ साहब साथ में है...शेर सुनेगे? जिन नारी छाया पड़े अंधे होत भुजंग...कबीरा उनकी क्या गति. जो नित नारी के संग....पेट से उबल कर हंसी होंठों पर बुल बुले छोड़ने लगी........गोली मारिये भाई साहब...मसाला खिलाइए....सादा है न?
Wednesday, September 22, 2010
बेचारी बारिश का क्या दोष. हर तरफ लोग बरखा को ही कोस रहे हैं.ऐसे में भीगी हुई ठण्ड से कांपती बरखा रानी हैरान है कि मैंने क्या किया है? जहां जहां मेरी साड़ी का आँचल लहराता था वहां वहां लोगों ने मेरे बदन को छील काट कर अपने घरौंदे बना लिए. बरसात ही तो है जब मैं अपनी रवानी में आती हूँ. अगर इन बूंदों में मैं थोडा इतरा जाती हूँ तो इतना हाय तौबा नहीं मचाना चाहिए. आखिर नदी को नदी होने का एहसास मैं ही तो दिलाती हूँ. नाले पनघट ताल पोखर कुँए बावली सब मेरी हो तो राह देखते हैं. और मैं कहाँ ठहरने वाली हूँ. मैं तो जज़्ब हो जाउंगी धरती के सीने में ताकि तुमको सरकारी इंडिया मार्का २ हैण्ड पम्प से अगले साल पानी मिल सके और जल निगम वाले कह सके कि देखिये हमने बोरिंग में पूरा पाइप डाला था.मेरे आँचल के किनारे को छोडो मुझे खुलने दो और मुझे खोलने दो अपनी बांहे ताकि मैं समंदर से मिल सकूं.मेरी बेताबी ही तुम्हे बाढ़ लगती है. अगर ४० - ५० साल में एक बार मुझ पर यौवन आता है तो तुम सब को तकलीफ हो जाती है.सुनो....बूंदों में ढलना सीखो.....हर किसी पर एक सा बरसना सीखो.........भिगोना सीखो और सूखी बंजर धरती के सीने में जज़्ब होना सीखो...........तब तुम जानोगे कि बारिश क्या होती है.
Tuesday, March 9, 2010
महिला बिल आज भी अब तक हाउस में रखा नहीं जा सका है... लालू गला फाड़ रहे हैं....नहीं चलने देंगे. अरे भाई कोई बिहार है जो नहीं चलने दोगे या फिर भैंस है जो नहीं चलने दोगे. यह संसद है जो चलेगी. हाँ पर एक बात अच्छी हुई कि इस बहाने से सबकी राजनीति का असली रंग दिख गया. जब संविधान में धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं है तो फिर इस बिल में क्यों माँगा जा रहा है? क्या मुस्लमान पुरुष सांसद आरक्षण के सहारे आये थे.नहीं न. और अगर मुलायम इतने ही मुलायम है मुस्लमान महिलाओं के लिए तो क्यों नहीं फिरोजाबाद से किसी मुस्लमान महिला को टिकट दिया.बात साफ़ है. इस देश में अब मुस्लमान के नाम पर वोट बैंक की सियासत बंद होनी चाहिए.और अगर धार्मिक आधार पर आरक्षण देना ही है तो फिर जैन,सिख,बौध,पारसी महिलाओं को भी क्यों नहीं देते?बल्कि मैं तो कहता हूँ कि सभी पारसी महिलाओं को सीट देना चाहिए. वोह हैं भी बहुत कम.यदुवंशियों को और उन सभी के लिए जिनका परिवार राजनितिक व्यवसाय में लगा हुआ है को डर है कि उनकी सीट रोस्टर में जा सकती है. मज़ा तो तब आया जब परम ज्ञानी राज ठाकरे भी कह रहे हैं कि लालू और मुलायम के आचरण से उनकी संस्कृति का पता चलता है. उत्तर प्रदेश और बिहार कि संस्कृति का आइना लालू और मुलायम नहीं है और न ही राज ठाकरे मराठी संस्कृति के मोउथ पीस. महिला बिल इसी दशा में पारित होना चाहिए. पर अगर अनुसूचित जाती और जन जाती कि महिलाओं के साथ पिछड़े वर्ग कि महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व होता तो अच्छा होता. अगर गहरे से देख्नेगे तो इस वर्ग कि महिलाएं ही परंपरा और मध्य वर्ग के बन्धनों के नाम पर पर राजनीती में कम दिखाई पड़ती है.
यह सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा...
Monday, March 8, 2010
कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पांव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हसीं नज़ारा तो है नज़र के लिए
वे मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकराक हूँ अव्वाज़ में असर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पांव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हसीं नज़ारा तो है नज़र के लिए
वे मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकराक हूँ अव्वाज़ में असर के लिए
महिला बिल संसद में पेश हुआ. क्या हुआ कैसे हुए...सब टीवी पे दिखा...कुछ कहना नहीं है कि किसकी इतनी इमानदार कोशिश है. सच सिर्फ इतना सा है कि आज ८ मार्च को भी बिल पास नहीं हो पाया. पास होना तो दूर उस पर बहस भी नहीं हो पायी. आधी आबादी के गुनाहगार वोह भी है जो इसे पास नहीं करवा सके और वोह तो हैं ही जो अपनी ज़मीन किसी और को देने को तैयार नहीं. यह जान के संतोष हुआ कि उपराष्ट्रपति भी बदसलूकी के दायरे से बहार नहीं हैं. इस देश के आचरण में घुल मिल गयी लंग पॉवर कि संस्कृति सही मायने में लोकतंत्र को आवाज़ देती हुई लगती है. वोह लोकतंत्र ही क्या जिसमे दबंगों,ठेकेदारों,माफियाओं,अवसर वादिओं,बे ईमान नेताओं और नेताओं से भी बे ईमान अफसरों के लिए जगह न हों. संसदीय लोकतंत्र में दिमाग कि जगह गले ने ली है जो पेट के कहने पे फटने लगता है. इस देश कि राजनैतिक विरासत अर्जित नहीं कि जा सकती...इस तो बस ट्रान्सफर किया जा सकता है....बाप से बेटे को...बीवी को ...बहू को...भतीजी को.... भतीजे को...साले को...बस.ख़ुशी कि बात है कि महिलाओं कि पहचान दलित,पिछड़े,मुस्लिम,अल्पसंख्यक के तौर पे होती है. मैं तो समझता था कि सब महिलाएं ही है...या तो भोगने के लिए या पूजने के लिए ..या तो ममता के लिए...या तो स्नेह बंधन के लिए...या तो जलने के लिए...या तो मार्केटिंग के लिए....या तो बलात्कार के लिए...या तो तिरस्कार के लिए...नेताओं को साधुवाद...अच्छा लगा जान कर कि देश में महिलाओं कि कुछ और भी श्रेणियां हैं. पर क्या सच में इस बिल से ..कुछ होगा. पंचायती राज में सविंधान संशोधन का असर सामने है. प्रधान पतियों से लेकर हर कई श्रेणी के नए पति अब मिलने लगे है जो कम से का बाहर ही ..पर अपनी पत्नी के एजेंट के तौर पे काम कारनमे लगे है और उनके अंगूठे कि छाप से अपनी मूंछों के लिए देशी घी का इंतज़ाम करते हैं. और क्या यह भी सच नहीं है कि इस बिल में महिलाओं के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं नहीं है....क्या महिलाऐं जाती के बंधन में नहीं बंधी है..अगर हैं तो फिर बैक वर्ड को क्यों नहीं शामिल किया गया. मुस्लमान सांसदों कि असली चिंता अपनी महिलाओं को आगे लाने कि नहीं लगती बल्कि किसी न किसी बहाने से धार्मिक सियासत चलाये रखने कि लगती है. ...एक और अच्छी खबर सुनाता हूँ. सुना है कि टीवी पर जे डी यु के संसद ने इस मुद्दे पर ज़रूरत पड़ने पर सर फोड़ने और ला मिनिस्टर के पेट में घूंसा मरने कि बात कही है. कहने कि ज़रूरत नहीं कि यह वीर पुरुष मुसलमान हैं. तो क्या ला मिनिस्टर बख्तर बंद पहन के संसद जायेंगे...जाना चाहिए..हमे अच्छा लगेगा और कुछ नया देखने को मिलेगा. और हाँ मेरी मानिये तो अपनी पत्नियों से इस पर चर्चा न करे. पेट में घूंसा खाना हो बेशक करे.
चर्चा खुली है....उडेलिये.....
चर्चा खुली है....उडेलिये.....
Ungaliyan
नयी गाडी खरीद कर रमेश बहुत खुश था. लाल रंग के शानदार चमकती हुई. आस पड़ोस में किसी ने भी नहीं खरीदी थी. माध्यम वर्ग की कुछ साबित करने कि खलिश इस देश कि मार्केट कि बड़ी मदद करती है. रोज़ कि तरह ही बिना ज्यादा गन्दी हुए ही गाड़ी कि धुलाई चल रही थी और ५ साल का बेटा पास में खेल रहा था....खेल खेल में उसने नयी गाड़ी पे खरोंच मार दी. पिता का परा चढ़ गया. बेटा दुश्मन लगने लगा. रिंच उठा कर बेटे का हाथ पत्थर पर रखा और कई चोट कर दी. बेटा बिलखने लगा. बाप का दिल नहीं पसीजा. कुछ देर बाद बेटे कि हिचकियाँ बंध गयी. फ़र्ज़ निभाया....बेटे को अस्पताल ले गए. डॉक्टर ने कहा चोट गहरी है. उंगलिया काटनी पड़ेगी. बाप तो मनो बुत बन गया. बेटे हो होश आया. अपनी कटी उँगलियों वाले हाथ में पट्टी बंधी देखी. पूछा. पापा मेरे नयी उंगलियाँ कब आएँगी?
चीज़ें इस्तेमाल करने और लोग प्यार करने के लिए होते है......न कि चीज़ें प्यार करने और लोग इस्तेमाल करने के लिए...
चीज़ें इस्तेमाल करने और लोग प्यार करने के लिए होते है......न कि चीज़ें प्यार करने और लोग इस्तेमाल करने के लिए...
Friday, March 5, 2010
उन्वान फ़साने का नहीं मिलता है...
कुछ लुत्फ़ ज़माने का नहीं मिलता है..
क्या दोस्त को रोयें कि जहां में अब तो
दुश्मन भी ठिकाने का नहीं मिलता है .
बिगड़ कुछ न सका कोई मेरा जीते जी
सभी को ही मेरे मरने का इंतज़ार रहा
भला रकीब मेरी ज़िन्दगी में क्या करते
मैं जब मरा भी तो दो चार पर सवार रहा .
प्यार का एक नया कानून बनाया जाये
दुश्मनों को भी कलेजे से लगाया जाये
एक तरफ काबा और एक तरफ बुतखाना
बीच में दोनों के मयखाना बनाया जाए .
और अंत में...
हम अपने दर्द कि तौहीन कर गए होते
अगर शराब न होती तो मर गए होते..
कुछ लुत्फ़ ज़माने का नहीं मिलता है..
क्या दोस्त को रोयें कि जहां में अब तो
दुश्मन भी ठिकाने का नहीं मिलता है .
बिगड़ कुछ न सका कोई मेरा जीते जी
सभी को ही मेरे मरने का इंतज़ार रहा
भला रकीब मेरी ज़िन्दगी में क्या करते
मैं जब मरा भी तो दो चार पर सवार रहा .
प्यार का एक नया कानून बनाया जाये
दुश्मनों को भी कलेजे से लगाया जाये
एक तरफ काबा और एक तरफ बुतखाना
बीच में दोनों के मयखाना बनाया जाए .
और अंत में...
हम अपने दर्द कि तौहीन कर गए होते
अगर शराब न होती तो मर गए होते..
Wednesday, March 3, 2010
यह मेरा बेटा है. बस ज़रा सा है. गौर से देखता हूँ तो हर बार लगता है कि मेरा बचपन मनो लौट आया है. पता नहीं क्यों मेरा बेटा भी मुझे गंभीरता से नहीं लेता जैसे में अपने आपको नहीं लेता....सुमति कह रहा था कि जब वोह अपनी बेटी का पैर अपने मुंह पर लगता है तो लगता है कि पेंटिंग हो रही है....मुझे तो बस इच्छा होती है कि अपने बेटे के पैरों को चूमता रहूँ....और कुछ नहीं...
WOMAN EMPOWERMENT
· DIMENSIOINS OF WOMAN EMPOWERMENT AS A PUBLIC POLICY IN INDIA
Why a public policy is required at all to address the question of woman Empowerment? Aren’t we responsible enough to give women their justified share? We in Hindu way of life believe, there is a certain place for everyone including trees and insects, but have not easily given up to this feeling. Like all other issues in India , empowerment of women also ,when addressed…. political context becomes unavoidable. Dealing with the questions of public policy, political comfort becomes supreme for the policy makers, no matter if she is a woman herself.
The administrative system cannot be isolated from the larger political system, as the latter influences the tone and the toner of the administration. Therefore public administration and framing of public policies should not and cannot be treated independent of its political context. Knowledge relevant to the control of society and individuals leads to societal direction system. This issue in particular demands combining philosophy with practical politics.
Woman Empowerment – Jawahar Lal Nehru had said,”You can tell the condition of the nation by looking at the status of the woman.” And then there is famous phrase from Manusmriti,” Na stree swatantrayam arhati” (woman is not eligible for independence). It reflects the attitude towards woman in our country. Often the lame excuse is woman are “weaker sex” while some call them “fairer sex”……why not only as woman? Issues like abortions, gender ratio, abduction, molestation etc are all associated with this so called weaker sex. A shocking study reveals that half of the world’s malnourished children live in India , as their mothers are devoid of the same. There is an urgent necessity of framing gender sensitive curricula at all stages of primary education to address sex stereotyping menace.
Woman should be allowed to work and should be provided enough safety and support to work. Legislatures such as Equal Remuneration Act, Factories Act, safe guards like maternity leaves should not only be enhanced but strengthened as well. Poverty eradication policies focusing woman should be implemented more emphatically. Macro economic policies would help in this drive. Through economic empowerment woman’s emancipation could be realized. Participation in decision making at all levels would help woman to strengthen themselves. The success of 73rd and 74th amendments should work as an eye opener in the way of Woman Reservation Bill. India started giving special attention to woman by the 5th five year plan, while the National Commission for Woman was setup only in 1990.
In 2001 National Policy for the Empowerment of Woman was declared. The soul was taken from our constitution which promises equality to women and empowers the state to adopt measures of positive discrimination in favor of women. India has also ratified to the International Convention on Elimination of all Forms of Discrimination Against Woman (CEDAW) in 1993. The Mexico Plan of Action(1975) and similar other declarations have been signed by India for appropriate follow up. But at home it is still a sorry state of affairs. Condition of women specially in rural areas has still not changed much and they are not being involved in democratic setup of the family which leads to decision making.
The goals of the National Policy for the Empowerment of Woman state to bring about the advancement , development and empowerment of women, while the objectives include.
· Creating an environment through positive economical and social policies for full development of women to enable them to realize their full potential.
· The de-jure and de-facto enjoyment of all human rights and fundamental freedom by women on equal basis with men in all spheres-political,economic,social,cultural and civil.
· Ewual eccess to participation and decision making of women in social,political and economic life of the nation.
· Equal access to health care,quality education,caree and vocational guidance,employment,equal wages,occupational health and safety,social security and public office etc.
· Strengthening legal system to eradicate all sorts of discriminations against women.
· Changing societal attitude towards women and girl child and mainstreaming a gender perspective in the development process.
·
KEY DIMENSIONS –
Swami Vivekanand had said , “ That country and that nation which doesn’t respect women will never become great now and nor will ever in future” But see we are dreaming to become a great nation , rather we believe we are a great nations without having our women at their desired place.
Four of the main processes that could lead to women’s empowerment , as defined by the IFDA evaluation, were:
Ø Changes in women’s mobility and social interaction.
Ø Changes in women’s labour patterns.
Ø Changes in women’s access to and control over resources, and
Ø Changes in women’s control over decision making.
The most common explanation of woman’s empowerment is the ability to exercise full control over one’s actions. There has been shift in the policy approach from the concept of “welfare” in the seventies to “development” in the eighties and now to “empowerment” in nineties. The constitution of India grants equality to women in various fields of life yet a larger number of women are either ill equipped or not in a position to propel themselves out of their traditionally unsatisfactory socio economic conditions.
In a state like India things are not going to change overnight. Ground level actions no matter how small they are in magnitude are required to kick start. This should be focused towards changing the social attitude and practices prevalent in the society which are highly biased against women.
A Reality check is required just to watch what is happening in the name of women empowerment. It is worthwhile to ponder on the fact that we are one of the worst in terms worldwide gender equality rankings. Lately women liberalization and women empowerment have been taken as a mixed bag. Liberty has been cornered to select dress code , occupational mobility, loosening family bonds , changing the stereotyped working pattern, changing partners and above of all choosing Woman above Mother. But this liberty is available to few and can be available to all only if they are empowered. The concept has a kinetic impact in country like India . Empowerment and liberty does not always come with respect from the society without which the story remains incomplete. The acceptability to women achievements is still not there in the society , forget the family where in certain cases the wife earns more than her husband.
SOLUTIONS- Do we have any. Have we been successful to achieve the goal of social equality with the help of Constitution and a number of bills, declarations, policies and gimmicks? Certainly not up to the mark but yes…….we have made a sizable dent in the age old system. So it becomes obvious to ask , woman empowerment can be achieved by law or by changing social perspective? Answer is by both. This is the law which leads to change the perspectives and as soon as woman are considered economically potential the mindset is due for a change. Woman have to come together as a unifying a force and initiate self empowering actions at the ground level. They should show their metal that they are not here to sell a man’s shaving cream or spent their noon watching saas –bahu serials. This is the high time involve women in the development of the country and to prepare them for the future. Efforts have been made and they are showing their impacts as well. Giving them rights in parental property, acknowledging single parent ship, acceptance of cremations and other rituals carried out by woman, participation in armed forces, politics, business etc have all lead to change woman’s status in the country.
In states like Uttar Pradesh where gender disparity and discrimination against woman is predominant phenomenon , schemes like Savitri Bai Phule Balika Shiksha Madad Yojna and Mahaya Maya Ashirvad Yojna have led to a positive change. Though it can be questioned that it should be without money but after all you a need a stimulus in our country and these schemes reduce economical burden from the parents. More such schemes with the aim to increase productivity should be launched and efforts should be made to benefit the girl child or woman directly. Respectful display of women through communication mediums is very important in order to prevent the image of women which establishes them as a sex object or an object of pleasure. More and more woman should be in the business of making men’s shaving cream rather that selling it in an advertisement. Market should be for the women and not by the women……….the way it is now.
Saturday, February 13, 2010
Thoda Antraal...
दोस्तों मैं कुछ समय के लिए बाहर जा रहा हूँ. इस बीच हो सकता है कि कुछ शेयर न कर पाऊँ. जल्दी ही लौटूगा...और फिर होगी ढेर सारी बातें.
Pata nahin yeh kya hai......?
जब मैं कॉलेज में था उस समय कि बकवास है......आज ऑफिस में सफाई करते समय पुराने कागजों में मिला...सोच कि लिख दूं ताकि सेफ रहे....१९९२
नारी मैं तुम्हे वृत्त मानता हूँ.एक ऐसा वृत्त जिसकी त्रिज्या अस्पष्ट है,तुम्हारे व्यवहार की तरह और जो गज भर लम्बी है तुम्हारी जुबान की तरह.इस वृत्त की परिधि मात्र एक न होकर तमाम संकेंद्रित परिधियों का समूह है .यह परिधियाँ जो सूचक है सामान्य नारी व्यवहार के यथा....लोभ,प्रपंच,मिथ्या भाषण,मोहिनी,छल,अप्व्ययिता,कपट,विद्वेष और नाना प्रकार के गुण धर्म.पर एक बात इस वृत्त के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है , जिस प्रकार कोई बच्चा गोला प्रकार से वृत्त खींचते समय प्रकार की नोक को काग़ज़ पे ज्यादा ही घुसा देता है उसी प्रकार विधाता ने भी नारी व्यव्हार वृत्त की रचना में केंद्र पर आवर्तों एवं परिधिओं की अपेक्षा अधिक श्रम और ध्यान दिया है.
अभी और भी है..........
नारी मैं तुम्हे वृत्त मानता हूँ.एक ऐसा वृत्त जिसकी त्रिज्या अस्पष्ट है,तुम्हारे व्यवहार की तरह और जो गज भर लम्बी है तुम्हारी जुबान की तरह.इस वृत्त की परिधि मात्र एक न होकर तमाम संकेंद्रित परिधियों का समूह है .यह परिधियाँ जो सूचक है सामान्य नारी व्यवहार के यथा....लोभ,प्रपंच,मिथ्या भाषण,मोहिनी,छल,अप्व्ययिता,कपट,विद्वेष और नाना प्रकार के गुण धर्म.पर एक बात इस वृत्त के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण है , जिस प्रकार कोई बच्चा गोला प्रकार से वृत्त खींचते समय प्रकार की नोक को काग़ज़ पे ज्यादा ही घुसा देता है उसी प्रकार विधाता ने भी नारी व्यव्हार वृत्त की रचना में केंद्र पर आवर्तों एवं परिधिओं की अपेक्षा अधिक श्रम और ध्यान दिया है.
अभी और भी है..........
Friday, February 12, 2010
Tumhara likha...
समीर, तुम्हारा ख़ूबसूरत सा कार्ड ढेर सारे प्यार को आग़ोश में समेटे हुए मेरे दरवाज़े पे आ खड़ा हुआ और तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा मेरी नज़रों में घूम गया.पता नहीं क्यों फ़ोन से कारगर ये कलम लगी और मैंने उठा ली....
"एक काग़ज़ ने तय किया रिश्ते का सफ़र,
फिर भी तनहा हूँ तुझसे बिछड़ जाने के बाद"
बस कुछ ख्याल उतरा रहे हैं. लिख दूं. और भरम नहीं यकीं पालूंगा कि लिखे को उतनी शिद्दत से समझोगे जितनी तड़प से लिखने वाला लिख रहा है.
इन दिनों कभी यह भी महसूस करते होगे कि तसल्ली और सकूँ ही सब कुछ नहीं.उस आवारगी में भी कुछ था जो शिकश्त के थपेड़ों से जन्मी थी.
"जब कभी माझी पे निगाह जाती है,
अपनी वोह बिखरी हुई दुनिया नज़र आती है,
याद आते हैं ज्यूँ अपनी शिकस्तों के पल,
तब कामयाबी पे मेरी आँख डबडबाती है"
उस आरामगाही हो हर कोई तलाशता है जिसको तुम पा सके हो. पर कब तक सकूँ कि चादर रास आती है?जहन में, बदन में,दिल में,जिगर में तो वही आवारगी बसी है.हो सके जब तक खाली हो कुछ लिख डालो, कुछ बुन डालो,एक अलग राह कि सैर .मैं तुम्हारी कलम पर पकड़ का कायल हूँ.और इसलिए अर्ज़ करूँगा कि कुछ लिख कर भेजो. और तय करने दो कागजों को रिश्तों का सफ़र .तुम्हारे ख़त के इंतज़ार में......
अज़ीज़.
"सुमति यह तुम्हारा लिखा हुआ ख़त है......ज्यों का त्यों ..देखो मैने कैसा सहेज कर रखा है......
Sunday, January 17, 2010
Kya Likhoon....
कल १८ जनवरी है. मेरी शादी को कल ३ साल पुरे हो रहे हैं. अभी थोड़ी देर पहले मैं अपनी पत्नी से पूछ रहा था कि हम दोनों एक साथ अभी खुश हैं या कि शादी के पहले खुश रहा करते थे. उसने कहा कि जवाब तुम्हे मालूम है. हर एक उस पल जब हम दोनों एक दूसरे को समझ नहीं पाए और कहा कि मैं कहाँ आ कर फंस गयी तुम्हारे साथ....तो मैने भी उसका जवाब यही कह कर के दिया कि मैं भी तुम्हे झेल रहा हूँ. पर चाहे जैसे भी हो हम ३ सालों से साथ हैं और आगे भी कम से कम मेरे लिए तो कोई उम्मीद नहीं है. पर एक बात और भी है...अगर अभी आज हम दोनों को आप्शन मिले कि जाओ टेक अ न्यू डिसीज़न...तब भी हम दोनों थक हार के एक दूसरे के ही पास आयेंगे. पिछले ३ सालों में हम दोनों एक दूसरे की कमियों और खूबियों के इतने आदि हो चुके हैं कि औब कहीं और लाइफ spaici नहीं लगती. इंडियन शादिओं कि यह एक बात बड़ी ख़ास है कि आपके आप्शन बड़ी जल्दी ख़तम हो जाते हैं और हम दोनों चाहे जितनी भी अडवांस क्यों न हो मियां और बीवी जैसा न केवल बिहैव करते हैं बल्कि सोचने भी लगते हैं. और एक मियां के अपनी कुछ सर्टेन ख्वाहिशें होती हैं जिन्हे बीवी एस अ rutene पूरा करती है और बीवी के तौर पे उसकी कुछ फरमाइश और खरी खोटी होती है जिसे नॉर्मली मियां बहुत कजुअली लेता है. हाँ मैं यह बात मानता हूँ कि हम दोनों एक गाडी के दो पहिये हैं...पर गाडी चलेगी तब न जब दोनों पहिये एक ही दिशा में चले नहीं तो गाडी एक जगह पे खड़ी रखने का क्या फायदा है? हमारी गाडी मूव तो करती है पर वापस आकर उसी पार्किंग में खड़ी हो जाती है. पर ३ साल में ज्यादा उम्मीद भी तो नहीं कर सकते न. अगर में मेरी बीवी से चाहूँगा तो मुझे भी देना पड़ेगा न. तो भैया अच्छा है कि स्पीड नोर्मल ही रहने दो. वैसे एक बात है...बीवी के रूप पे मानो आपको एक खाली स्टेज मिल जाता है जहाँ आप कुछ भी अनाप शनाप कहते रहो कोई आपको सड़े अंडे टमाटर या जूते नहीं मारता और आप तसल्ली से अपनी सारी गन्दगी उड़ेल कर हलके हो जाते हैं. हैं न अच्छी बात.अलग अलग जगह से आने और अलग होने के बाद भी जिस तरह से दो रंगों को मिला कर एक नया रंग बनता है उसी तरह से लाइफ एक अजीब से नए रंग में रंग जाती है जिसे आपने पहले कभी नहीं देखा होता है. आपका रंग होता तो है पर बगल में किसी दूसरे शेड के साथ.
तीन सालों में हमने अलग अलग एक दूसरी को क्या दिया या कितना दिया उस पर तो कभी सहमति नहीं बन पायी पर हम दोनों ने मिल एक दूसरे को एक अनमोल गिफ्ट दिया है और वोह है हमारा डेढ़ बरस का बेटा. अब तो अगर हम दोनों में से किसी को चिल्लाना भी होता है तो यह सोच कर चुप रह जाते है कि बेटा कॉपी करेगा .वैसे बेटा सेफ्टी वोल्व का काम करता है. एक दूसरे से गुस्सा हम दोनों उसको देख कर हंस पड़ते हैं...और फिर अपने अपने काम में. यह सच है कि शादी के बाद नया करने कि गुंजाईश कम हो जाती पर लाइफ में ठहराव आ जाता है और हम निश्चिन्त हो जाते हैं कि चलो कम से कम हम अब घर बार वाले हो गए और लाइफ कि बहुत सारी प्राथमिकतायें बदल जाती हैं. मैने उसके हिसाब से खुद को कितना बदला है यह मैं नहीं कह सकता....पर इतना ज़रूर है कि अब घर आकर मैं सेफ फील करता हूँ. मैं मेरे बीवी और बेटे को मिस करता हूँ जब भी वो बहार होते हैं, मुझे उनकी चिंता होती है यह और बात है कि सामने आते ही फिर पहले जैसे हो जाता है.पर ऐसा कोई मेरे साथ ही थोड़ी होता होगा? है न? ऋचा ने खुद को मेरे हिसाब से बहुत बदला है और मेरी पसंद कि चीजों को करने कि कोशिश भी की है..अब अभी करती है....मैं बहुत क्रिटिकल हूँ और उसको हर बात में तारीफ़ चाहिए....एक मान के रूप में , एक कम्पनिओन के रूप में और अब एक पत्नी के रूप में भी उसने धीरे धीरे अपनी जगह पक्की कर ली है.....
तीन सालों में हमने अलग अलग एक दूसरी को क्या दिया या कितना दिया उस पर तो कभी सहमति नहीं बन पायी पर हम दोनों ने मिल एक दूसरे को एक अनमोल गिफ्ट दिया है और वोह है हमारा डेढ़ बरस का बेटा. अब तो अगर हम दोनों में से किसी को चिल्लाना भी होता है तो यह सोच कर चुप रह जाते है कि बेटा कॉपी करेगा .वैसे बेटा सेफ्टी वोल्व का काम करता है. एक दूसरे से गुस्सा हम दोनों उसको देख कर हंस पड़ते हैं...और फिर अपने अपने काम में. यह सच है कि शादी के बाद नया करने कि गुंजाईश कम हो जाती पर लाइफ में ठहराव आ जाता है और हम निश्चिन्त हो जाते हैं कि चलो कम से कम हम अब घर बार वाले हो गए और लाइफ कि बहुत सारी प्राथमिकतायें बदल जाती हैं. मैने उसके हिसाब से खुद को कितना बदला है यह मैं नहीं कह सकता....पर इतना ज़रूर है कि अब घर आकर मैं सेफ फील करता हूँ. मैं मेरे बीवी और बेटे को मिस करता हूँ जब भी वो बहार होते हैं, मुझे उनकी चिंता होती है यह और बात है कि सामने आते ही फिर पहले जैसे हो जाता है.पर ऐसा कोई मेरे साथ ही थोड़ी होता होगा? है न? ऋचा ने खुद को मेरे हिसाब से बहुत बदला है और मेरी पसंद कि चीजों को करने कि कोशिश भी की है..अब अभी करती है....मैं बहुत क्रिटिकल हूँ और उसको हर बात में तारीफ़ चाहिए....एक मान के रूप में , एक कम्पनिओन के रूप में और अब एक पत्नी के रूप में भी उसने धीरे धीरे अपनी जगह पक्की कर ली है.....
Friday, January 15, 2010
Kab ke bichhde...
एक ख़त तुम्हारे नाम. सुमति.यार जब तुम लिखते हो तुम पर बड़ा प्यार आता है. यह बूँद बूँद कर के प्यास मत बुझाया करो ...दरिया उड़ेल दो....पर ध्यान रखना ..सुना है कि अगर कोई बहुत दिनों का प्यासा हो तो उसकी प्यास भी तड़पा तड़पा कर के ही बुझानी चाहिए...ऐसा है क्या? पर मैं क्या करूँ..मैं तो पूरा दरिया ही हलक में उतारना चाहता हूँ. मय कि तुमको ज़रूरत नहीं पड़ती और हम हैं कि मयखाने में ही अपनी मय्यत का इंतज़ाम देखना चाहते हैं.सुन यार देख....यह नशा जो है न कुछ पलों के लिए ही सही मुझे तुझसे मिला तो देता है न...फिर मैं इसे बुरा कैसे कह सकता हूँ. मेरी जान...तुझे याद है जब हम दोनों वक़्त के हिचकोलों पर सवार थे और एक ही स्टेशन पर उतरना चाह था..पर तू पहले उतर गया और मैं बाद में गाडी छोड़ पाया...और तब के छूते तो अब तक सफ़र तमाम कर रहे हैं. क्या बेकारी के दिन अच्छे थे? पता नहीं सच सच नहीं कह सकता. रोटी बाकि सब बातों पर इतनी भारी पड़ गयी है कि और कुछ देखना नहीं चाहता.फिर अब मेरे दिल में भी तो न जाने कौन कौन मर्ज़ी या बेमर्ज़ी के घर कर गया है न? अब ख्याल तो रखना ही पड़ेगा न. मेहमान जो ठहरे .अच्छा सुन....
बंद कर के कभी आँखों को ख्वाब देखा है?
वो रंग स्याह है या सुर्ख कभी देखा है?
कि वक़्त पानियों पे अक्स जो बनाता है..
उसे उतार के काग़ज़ पे कभी देखा है?
कभी देखना ..पता चलेगा कि वक़्त ने काग़ज़ के साथ क्या किया है?
पतंग बन के हवाओं के घर गए हो कभी?
ख्याल बन के मेरी सोच में ढले हो कभी?
कि तुमको याद कभी आती है वो फांकाकशी?
किसी कि हसरतों के वास्ते रुके हो कभी?
कैसे रुकोगो? रुक जाने का नाम तो ज़िन्दगी नहीं है न? पर...
हम अगर थाम ले बाहें कभी और यूँ पूछे...
बताओ आज ...हमें कितना प्यार करते हो?
रुकोगो , सांस भर के सोचोगे ..
और कहोगे कि कैसा सवाल पूछा है?
ऐसा कई बार होता है जब हम यह सोच कर कुछ नहीं कहते कि कहना क्या है...तुम्हे तो पता ही है न? कैसे पता होगा? अब तू तुम्हारी परछाईं भी मेरे साथ नहीं चलती...कमबख्त ने तुम्हारा बाजु थाम लिया है...
मिलते रहो.. बिखरते रहो और मुझ पर यूँ ही बरसते रहो....
बंद कर के कभी आँखों को ख्वाब देखा है?
वो रंग स्याह है या सुर्ख कभी देखा है?
कि वक़्त पानियों पे अक्स जो बनाता है..
उसे उतार के काग़ज़ पे कभी देखा है?
कभी देखना ..पता चलेगा कि वक़्त ने काग़ज़ के साथ क्या किया है?
पतंग बन के हवाओं के घर गए हो कभी?
ख्याल बन के मेरी सोच में ढले हो कभी?
कि तुमको याद कभी आती है वो फांकाकशी?
किसी कि हसरतों के वास्ते रुके हो कभी?
कैसे रुकोगो? रुक जाने का नाम तो ज़िन्दगी नहीं है न? पर...
हम अगर थाम ले बाहें कभी और यूँ पूछे...
बताओ आज ...हमें कितना प्यार करते हो?
रुकोगो , सांस भर के सोचोगे ..
और कहोगे कि कैसा सवाल पूछा है?
ऐसा कई बार होता है जब हम यह सोच कर कुछ नहीं कहते कि कहना क्या है...तुम्हे तो पता ही है न? कैसे पता होगा? अब तू तुम्हारी परछाईं भी मेरे साथ नहीं चलती...कमबख्त ने तुम्हारा बाजु थाम लिया है...
मिलते रहो.. बिखरते रहो और मुझ पर यूँ ही बरसते रहो....
Thursday, January 14, 2010
O' My Kanpur
Hi guys.............I am back after a long gap. The life took a U turn in the last 4 months. I shifted to a new city and now trying to adjust here, or should I say that the new city is demanding it. I miss my life in Kanpur. It really happened a lot over that last one year. Colorful evenings, great wines, cool places, wonderful company and a posting of lifetime. You know that it is your circle which makes you miss the place. The new city is also on the bank of river Ganga. This is my third district of posting, on the bank of Ganga.Varanasi was the first in U.P.I forget to shape my thoughts in the last few months and poetry................uummmm...lemme think...O common...only few years. Okie....I understand. Will try to be regular with a variety of topics to share with you.Take care.
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