Wednesday, September 22, 2010

बेचारी बारिश का क्या दोष. हर तरफ लोग बरखा को ही कोस रहे हैं.ऐसे में भीगी हुई ठण्ड से कांपती बरखा रानी हैरान है कि मैंने क्या किया है? जहां जहां मेरी साड़ी का आँचल लहराता था वहां वहां लोगों ने मेरे बदन को छील काट कर अपने घरौंदे बना लिए. बरसात ही तो है जब मैं अपनी रवानी में आती हूँ. अगर इन बूंदों में मैं थोडा इतरा जाती हूँ तो इतना हाय  तौबा नहीं मचाना चाहिए. आखिर नदी को नदी होने का एहसास मैं ही तो दिलाती हूँ. नाले पनघट ताल पोखर कुँए बावली सब मेरी हो तो राह देखते हैं. और मैं कहाँ ठहरने वाली हूँ. मैं तो जज़्ब हो जाउंगी धरती के सीने में ताकि तुमको सरकारी इंडिया मार्का २ हैण्ड पम्प से अगले साल पानी मिल सके और जल निगम वाले कह सके कि देखिये हमने बोरिंग में पूरा पाइप डाला था.मेरे आँचल के किनारे को छोडो मुझे खुलने दो और मुझे खोलने दो अपनी बांहे ताकि मैं समंदर से मिल सकूं.मेरी बेताबी ही तुम्हे बाढ़ लगती है. अगर ४० - ५० साल में एक बार मुझ पर यौवन आता है तो तुम सब को तकलीफ हो जाती है.सुनो....बूंदों में ढलना सीखो.....हर किसी पर एक सा बरसना सीखो.........भिगोना सीखो और सूखी बंजर धरती  के सीने में जज़्ब होना सीखो...........तब तुम जानोगे कि बारिश क्या होती है.

1 comment:

toshi said...

बूंदों में ढलना सीखो.....हर किसी पर एक सा बरसना सीखो.........भिगोना सीखो और सूखी बंजर धरती के सीने में जज़्ब होना सीखो...........तब तुम जानोगे कि बारिश क्या होती है........ye to kafi philosophical ho gaya...point to ponder :)