Tuesday, March 9, 2010

महिला बिल आज भी अब तक  हाउस में रखा नहीं जा सका है... लालू गला फाड़ रहे हैं....नहीं चलने देंगे. अरे भाई कोई बिहार है जो नहीं चलने दोगे या फिर भैंस है जो नहीं चलने दोगे. यह संसद है जो चलेगी. हाँ पर एक बात अच्छी हुई कि इस बहाने से सबकी राजनीति का असली रंग दिख गया. जब संविधान में धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं है तो फिर इस बिल में क्यों माँगा जा रहा है? क्या मुस्लमान पुरुष सांसद आरक्षण के सहारे आये थे.नहीं न. और अगर मुलायम इतने ही मुलायम है मुस्लमान महिलाओं के लिए तो क्यों नहीं फिरोजाबाद से किसी मुस्लमान महिला को टिकट दिया.बात साफ़ है. इस देश में अब मुस्लमान के नाम पर वोट बैंक की सियासत बंद होनी चाहिए.और अगर धार्मिक आधार पर आरक्षण देना ही है तो फिर जैन,सिख,बौध,पारसी महिलाओं को भी क्यों नहीं देते?बल्कि मैं तो कहता हूँ कि सभी पारसी महिलाओं को सीट देना चाहिए. वोह हैं भी बहुत कम.यदुवंशियों को और उन सभी के लिए जिनका परिवार राजनितिक व्यवसाय में लगा हुआ है को डर है कि उनकी सीट रोस्टर में जा सकती है. मज़ा तो तब आया जब परम ज्ञानी राज ठाकरे भी कह रहे हैं कि लालू और मुलायम के आचरण से उनकी संस्कृति का पता चलता है. उत्तर प्रदेश और बिहार कि संस्कृति का आइना लालू और मुलायम नहीं  है और न ही राज ठाकरे मराठी संस्कृति के मोउथ पीस. महिला बिल इसी दशा में पारित होना चाहिए. पर अगर अनुसूचित जाती और जन जाती कि महिलाओं के साथ पिछड़े वर्ग कि महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व होता तो अच्छा होता. अगर गहरे से देख्नेगे तो इस वर्ग कि महिलाएं ही परंपरा और मध्य वर्ग के बन्धनों के नाम पर पर राजनीती में कम दिखाई पड़ती है.


यह सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा...

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