महिला बिल संसद में पेश हुआ. क्या हुआ कैसे हुए...सब टीवी पे दिखा...कुछ कहना नहीं है कि किसकी इतनी इमानदार कोशिश है. सच सिर्फ इतना सा है कि आज ८ मार्च को भी बिल पास नहीं हो पाया. पास होना तो दूर उस पर बहस भी नहीं हो पायी. आधी आबादी के गुनाहगार वोह भी है जो इसे पास नहीं करवा सके और वोह तो हैं ही जो अपनी ज़मीन किसी और को देने को तैयार नहीं. यह जान के संतोष हुआ कि उपराष्ट्रपति भी बदसलूकी के दायरे से बहार नहीं हैं. इस देश के आचरण में घुल मिल गयी लंग पॉवर कि संस्कृति सही मायने में लोकतंत्र को आवाज़ देती हुई लगती है. वोह लोकतंत्र ही क्या जिसमे दबंगों,ठेकेदारों,माफियाओं,अवसर वादिओं,बे ईमान नेताओं और नेताओं से भी बे ईमान अफसरों के लिए जगह न हों. संसदीय लोकतंत्र में दिमाग कि जगह गले ने ली है जो पेट के कहने पे फटने लगता है. इस देश कि राजनैतिक विरासत अर्जित नहीं कि जा सकती...इस तो बस ट्रान्सफर किया जा सकता है....बाप से बेटे को...बीवी को ...बहू को...भतीजी को.... भतीजे को...साले को...बस.ख़ुशी कि बात है कि महिलाओं कि पहचान दलित,पिछड़े,मुस्लिम,अल्पसंख्यक के तौर पे होती है. मैं तो समझता था कि सब महिलाएं ही है...या तो भोगने के लिए या पूजने के लिए ..या तो ममता के लिए...या तो स्नेह बंधन के लिए...या तो जलने के लिए...या तो मार्केटिंग के लिए....या तो बलात्कार के लिए...या तो तिरस्कार के लिए...नेताओं को साधुवाद...अच्छा लगा जान कर कि देश में महिलाओं कि कुछ और भी श्रेणियां हैं. पर क्या सच में इस बिल से ..कुछ होगा. पंचायती राज में सविंधान संशोधन का असर सामने है. प्रधान पतियों से लेकर हर कई श्रेणी के नए पति अब मिलने लगे है जो कम से का बाहर ही ..पर अपनी पत्नी के एजेंट के तौर पे काम कारनमे लगे है और उनके अंगूठे कि छाप से अपनी मूंछों के लिए देशी घी का इंतज़ाम करते हैं. और क्या यह भी सच नहीं है कि इस बिल में महिलाओं के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं नहीं है....क्या महिलाऐं जाती के बंधन में नहीं बंधी है..अगर हैं तो फिर बैक वर्ड को क्यों नहीं शामिल किया गया. मुस्लमान सांसदों कि असली चिंता अपनी महिलाओं को आगे लाने कि नहीं लगती बल्कि किसी न किसी बहाने से धार्मिक सियासत चलाये रखने कि लगती है. ...एक और अच्छी खबर सुनाता हूँ. सुना है कि टीवी पर जे डी यु के संसद ने इस मुद्दे पर ज़रूरत पड़ने पर सर फोड़ने और ला मिनिस्टर के पेट में घूंसा मरने कि बात कही है. कहने कि ज़रूरत नहीं कि यह वीर पुरुष मुसलमान हैं. तो क्या ला मिनिस्टर बख्तर बंद पहन के संसद जायेंगे...जाना चाहिए..हमे अच्छा लगेगा और कुछ नया देखने को मिलेगा. और हाँ मेरी मानिये तो अपनी पत्नियों से इस पर चर्चा न करे. पेट में घूंसा खाना हो बेशक करे.
चर्चा खुली है....उडेलिये.....
No comments:
Post a Comment