उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों कि पांच साला नौटंकी चालू हो गयी है. ढोल नगाड़े सब बज रहे हैं और बेचारे एस डी एम् साहब माइक पकड़ कर जनता को समझा रहे हैं कि देखो भाई कुछ गड़ बड़ मत करना. सूची बन गयी है.वारंट निकल गया है . कोई बचने नहीं पायेगा . माथे से पसीना बह कर कान के पीछे वाले गलियारे से होता हुआ बनियान में कहीं वांटेड और इनामिया कि तरह गुम हो गया है. आरक्षण बदल गया है भैया. बाबू साहब की परधानी के दिन गए. अब तो रामेसरा परधान बनेगा. सुना है पिछले वाले परधान ने मनरेगा और मिड डे मील में बड़ी मलाई काटी है. सब सरकारी धन कि लुटाई है भैया नहीं तो एक दिन में भला परधानी १५०० पर्चे थोड़े ही दाखिल हो जाते. बाबू साहब कि पीड़ा खाली इतनी भर नहीं है. कई जगह तो इस आरक्षण ने बाबू साहब लोगों कि पैंट ढीली करके साडी में बदल दी है. रात में आजकल लुगाई का पैर दबाते हुए दुर्योधन सिंह चम्पावती को सब उंच नीच समझा रहे है. देखना परचा ठीक काउंटर पर ही जमा करना. और साडी वोह नयी वाली ही डालना जो मैं छपरा से लाया था. चम्पावती आँख बंद कर के सुन रही थी. कितना लम्बा घूँघट डालना है जी? अरे यह भी कोई पूछने कि बात है? परधानी लड़ने का मतलब यह थोड़े ही है कि औरत अपनी मान मर्यादा त्याग दे...........सुनो......दुर्जन कि अम्मा ..हम हैं बाद में सब सँभालने के लिए. अरे तुम कहे चिंता करती हो........हम सब संभाल लेंगे......तुमको कुछ नहीं करना पड़ेगा.....या ऐसा कहो कि कुछ करने नहीं दोगे. चम्पावती बुदबुदाई .बस एक ही चिंता है. इस बार डी एम् पार्टी का खर्चा बहुत बढ़ गया है. ई का है जी? अरे डी एम् पार्टी मतलब....दारु मुर्गा पार्टी. साले कहते हैं...चाय समोसा कच्चा बा....दारू मुर्गा पक्का बा.
एस डी एम् बैरिया फ्रॉम कण्ट्रोल....कैरी ऑन....जय हिंद सर.शाम को ४ बजे से फ्लैग मार्च निकलना है सर. ठीक है नोट किया. सर में दर्द हो रहा है. आगे ट्रक वाले ने रास्ता जाम कर रखा है.मुश्किल है. यह फ्लैग मार्च अयोध्या के लिए है. पब्लिक भी सब समझती है और चम्पावती भी. सी ओ साहब साथ में है...शेर सुनेगे? जिन नारी छाया पड़े अंधे होत भुजंग...कबीरा उनकी क्या गति. जो नित नारी के संग....पेट से उबल कर हंसी होंठों पर बुल बुले छोड़ने लगी........गोली मारिये भाई साहब...मसाला खिलाइए....सादा है न?
Wednesday, September 29, 2010
Wednesday, September 22, 2010
बेचारी बारिश का क्या दोष. हर तरफ लोग बरखा को ही कोस रहे हैं.ऐसे में भीगी हुई ठण्ड से कांपती बरखा रानी हैरान है कि मैंने क्या किया है? जहां जहां मेरी साड़ी का आँचल लहराता था वहां वहां लोगों ने मेरे बदन को छील काट कर अपने घरौंदे बना लिए. बरसात ही तो है जब मैं अपनी रवानी में आती हूँ. अगर इन बूंदों में मैं थोडा इतरा जाती हूँ तो इतना हाय तौबा नहीं मचाना चाहिए. आखिर नदी को नदी होने का एहसास मैं ही तो दिलाती हूँ. नाले पनघट ताल पोखर कुँए बावली सब मेरी हो तो राह देखते हैं. और मैं कहाँ ठहरने वाली हूँ. मैं तो जज़्ब हो जाउंगी धरती के सीने में ताकि तुमको सरकारी इंडिया मार्का २ हैण्ड पम्प से अगले साल पानी मिल सके और जल निगम वाले कह सके कि देखिये हमने बोरिंग में पूरा पाइप डाला था.मेरे आँचल के किनारे को छोडो मुझे खुलने दो और मुझे खोलने दो अपनी बांहे ताकि मैं समंदर से मिल सकूं.मेरी बेताबी ही तुम्हे बाढ़ लगती है. अगर ४० - ५० साल में एक बार मुझ पर यौवन आता है तो तुम सब को तकलीफ हो जाती है.सुनो....बूंदों में ढलना सीखो.....हर किसी पर एक सा बरसना सीखो.........भिगोना सीखो और सूखी बंजर धरती के सीने में जज़्ब होना सीखो...........तब तुम जानोगे कि बारिश क्या होती है.
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