Sunday, September 16, 2012

RAAM KE NAAM (2)


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Friday, August 31, 2012

RAAM KE NAAM

सरयू का पानी धीरे धीरे अपनी अपनी मंजिल की तरफ बह रहा था। सरयू ने खुद को जैसे इतने युगों से बाकी दुनिया से अलग कर लिया है। एक नदी के रूप में सरयू अपना कर्तव्य निभा रही है पर  अब किसी को जीवन देने की उसकी इच्छा नहीं बची है। बुढ़ाती सरयू ने अपने इन्ही किनारों पर ज़िन्दगी के स्याह और सुर्ख  रंग देखे हैं . सरयू को याद आता है वोह समय जब आकाश में चाँद चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में  नौ दिन  का बालक        था। दशरथ के घर में राम पैदा हुए थे . सरयू कितना नाची थी उस समय। अपने किनारे तोड़ कर बह निकली थी। 

एक लहर के साथ सरयू ने अपने मन से पुरानी  बातों को निकालने  की कोशिश क़ी . अचानक जैसे उसे कुछ याद आया . हाय राम मैं तो भूल ही गयी थी। सरयू ने इस गलती के लिए अपना सर किनारे पर पड़े पत्थरों पर दे मारा और बूँद बूँद हो कर बिखर गयी। मेरा बेटा अभी तक सोया पड़ा है। कई युग बीत गए पर मेरे बेटे की आँख नहीं खुली। युगों से राम को अपने अंक में  चिपकाये बावरी सी होकर सरयू बह रही है। 

राम सो रहे हैं। उठना नहीं चाहते . मैया की हिचकोले खाती गोदी में हजारों सालों से राम का शरीर झूला झूल रहा हैं। जाने कितनी बार करवट ली होगी , जाने कितनी बार मैया ने आकुल हो कर आवाज़ दी होगी पर राम ने एक बार भी आँख न खोली। आखिर आँखें खोले भी तो कैसे। वैदेही की  अग्नि परीक्षा भी राम ने देखी है और उसका इस अपमान से व्याकुल होकर धरती में समाना  भी राम ने इन्ही आँखों से देखा है।राम को अब जैसे कुछ और देखना नहीं है। इन आखों को खोल कर राम अपना प्रतिबिम्ब भी नहीं देखना चाहते। सीता के लिए उनका प्रेम क्या था  राम जैसे कुछ समझ नहीं पा रहे हैं। संसार के लिए एक ईश्वरीय कौतुक या फिर कुछ और। संसार के लिए पोषक और पालक  नियम बनाने में क्या सबसे पहले अपनों की ही बलि देना अनिवार्य है? क्या मर्यादा रेखाएं खीचने के लिए अपने ही सुख के प्राण तंतुओं को खींचना ज़रूरी है? 

नदी की गहराई में राम का शरीर दो  पत्थरों के बीच रुका हुआ था। काल चक्र ने राम के शरीर का अपघटन रोक रखा था। राम पिघलना चाहते थे पर नियति शायद उन्हें उनके शरीर के साथ ही रखना चाहती है । शरीर से अलग न हो पाने के कारण  राम का देवत्व भी स्थगित हो गया है। पार्थिव रूप में किये गए कर्मों का सूत्र ही राम को देवत्व तक ले जाने वाला था पर जैसे कहीं कोई कमी रह गयी थी। देह को पूरी तरह से पार्थिव मान कर उसकी उपेक्षा भी करना राम ने सीखा नहीं था। राम जानते थे कि उनका देवता उनके शरीर में ही कहीं आविष्ट है। शरीर साधन से देव संधान का महात्म्य राम खूब जानते हैं । शरीर को उन्होंने ने प्रथमतर रख कर ही सीता के प्रति अपने देवत्व का प्रदर्शन नियंत्रित रखा था। पर अब उनका अपने शरीर  से पृथक होना ही मानो उनके लिए लिखी गयी भूमिका का  अंतिम दृश्य रह गया है। 

दिसंबर के महीने में सरयू का पानी भी खून जमा देने वाला था। किनारों पर शाम के समय कोई कोई ही दिखाई पड़ता था। सरयू भी जैसे किसी को देखना नहीं चाहती थी। बालू भरे किनारों को छोड़ कर सरयू मानों खुद में सिमट रही थी। बीच बीच में इधर उधर निकले भूमि खंड उसके दग्ध हृदय के मूर्छित खंडो जैसे बेजान दिखाई पड़ते थे। 

राम    बेटा    राम।
सरयू ने कातर हो कर पुकारा। उठो बेटा। 

राम गंभीर भाव में डूबे हुए थे। क्या बाहरी जगत के लिए कर्म प्रधान अभिनय उनके वास्तविक स्वरुप के साथ साम्य बना सका था। क्या उन्होंने सब कुछ वैसा ही नहीं  किया जैसा विधाता ने उनके लिए लिखा था। राम जानते हैं की सृष्टि के नियम सबसे ऊपर हैं। पर नियम बनाता कौन है। राम को अपनी क्षमता का आभास है। क्यों नहीं उन्होंने  अपने लिए थोड़ी आसान और सुखद भूमिका नियंता से मांग  ली। क्यों उनको  
आजन्म ऐसी भूमिका निभानी पड़ी जिसमे सहयोगियों के बिना उनका प्रदर्शन पूरा नहीं होता है । राम ने सोचा काश वो पूरी तरह से मनुष्य होते। मनुष्य भाव क्या देवत्व से श्रेष्ट है? राम भ्रमित हैं।
 देवत्व में मनुष्यता का यह संगम राम पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं । देव कौन है और मानव कौन। मानव ही देवताओं को पहचानता है या की देवता भी कभी मनुष्यों को समझते हैं। देवताओं का सम्मान क्या मनुष्यों के कारण ही नहीं है। अगर मनुष्य स्वयं  भी देवता बनना चाहते हैं तो यह स्वाभाविक ही है। पर यहाँ तो राम के अन्दर मनुष्यता अकुला रही है। मैं हूँ क्या? राम ने खुद से पूछा। देव या मनुष्य। शायद न तो पूरा देव और निश्चित ही अधूरा  मनुष्य। राम की आँखों का नीर सरयू के जल में विलीन हो गया। सीता और अपने पुत्रों के साथ क्यों नहीं मैं भी संसारिक जीवन में आसक्त हो सका। और अगर ऐसा करना विधि के नियोजन के विपरीत था तो क्यों नहीं फिर सभी को वही  देव तत्त्व विधाता ने दिया । क्या मानवीय भूमिकाओं में अवतरित देवताओं को दुःख झेलना अनिवार्य है। क्या यह प्रहसन थोडा सुखद नहीं हो सकता था। दैवीय अवतारों का उद्देश्य यदि मनुष्यता को जीवंत करना और उनका कल्याण करना है तो क्यों अवतारों को स्वयं कष्ट उठाना अनिवार्य हो जाता है। स्वयं को कष्ट दे कर ही प्राणि मात्र के कल्याण की कामना करना थोडा अतार्किक लगता है। फिर समाज के लिए ऐसी मर्यादा रखने का क्या लाभ जिसमे अपने ही प्रियजनों को त्यागना पड़े। क्या त्याज्य ही प्राप्य है? क्या एक मानव के रूप में माया और लोभ के साथ ऐहिक सुखों का उपभोग नहीं किया जा सकता। क्या देह के साथ देवत्व एकाकार नहीं हो सकता। क्या देहता ही देवता नहीं हो सकती। क्या दैहिक ही दैविक नहीं हो सकता। अपने शरीर को पूजनीय मानने वाले और अपने शरीर को ही देवता के सामान तृप्त करने वाले मनुष्य क्या श्रेष्ट नहीं है। 
राम  को उत्तर नहीं मिल रहा था। विचारों के बेतरतीब जंगल से बाहर  निकलने की कोई राह नहीं दिख रही है। और फिर देवता बनना क्यों आवश्यक है। देवता सुख जानते हैं पर आनंद नहीं। देवता समर्पण जानते हैं पर भाव नहीं। देवता तो अपने दुःख का प्रदर्शन आंसुओं से भी नहीं कर सकते। देवताओं के नेत्र सर्वदा खुले ही रहते हैं। उनमे आंसू भी सूख जाते हैं। निर्निमेष देवता सब घटित, अघटित को अपलक देखते रहते हैं। देवता दान देते हैं पर पात्रता नहीं देखते। सम भाव से सब कुछ पूर्व योजना की भांति घटित होता देखने के लिए देवता बाध्य हैं। कल्पित, अकल्पित, आगम, निगम सब कुछ बस चलता ही रहता है। कोई प्रतिरोध नहीं कोई  व्यतिक्रम नहीं और कोई हस्तक्षेप भी नहीं। वर्तमान भी नियोजित और भविष्य भी। राम की आँखों का आंसूं देवत्व में मनुष्यता का प्रदुषण है या विभूषण , राम चकित हैं।