यह मेरा बेटा है. बस ज़रा सा है. गौर से देखता हूँ तो हर बार लगता है कि मेरा बचपन मनो लौट आया है. पता नहीं क्यों मेरा बेटा भी मुझे गंभीरता से नहीं लेता जैसे में अपने आपको नहीं लेता....सुमति कह रहा था कि जब वोह अपनी बेटी का पैर अपने मुंह पर लगता है तो लगता है कि पेंटिंग हो रही है....मुझे तो बस इच्छा होती है कि अपने बेटे के पैरों को चूमता रहूँ....और कुछ नहीं...
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