कहाँ तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पांव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही
कोई हसीं नज़ारा तो है नज़र के लिए
वे मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकराक हूँ अव्वाज़ में असर के लिए
No comments:
Post a Comment