"एक काग़ज़ ने तय किया रिश्ते का सफ़र,
फिर भी तनहा हूँ तुझसे बिछड़ जाने के बाद"
बस कुछ ख्याल उतरा रहे हैं. लिख दूं. और भरम नहीं यकीं पालूंगा कि लिखे को उतनी शिद्दत से समझोगे जितनी तड़प से लिखने वाला लिख रहा है.
इन दिनों कभी यह भी महसूस करते होगे कि तसल्ली और सकूँ ही सब कुछ नहीं.उस आवारगी में भी कुछ था जो शिकश्त के थपेड़ों से जन्मी थी.
"जब कभी माझी पे निगाह जाती है,
अपनी वोह बिखरी हुई दुनिया नज़र आती है,
याद आते हैं ज्यूँ अपनी शिकस्तों के पल,
तब कामयाबी पे मेरी आँख डबडबाती है"
उस आरामगाही हो हर कोई तलाशता है जिसको तुम पा सके हो. पर कब तक सकूँ कि चादर रास आती है?जहन में, बदन में,दिल में,जिगर में तो वही आवारगी बसी है.हो सके जब तक खाली हो कुछ लिख डालो, कुछ बुन डालो,एक अलग राह कि सैर .मैं तुम्हारी कलम पर पकड़ का कायल हूँ.और इसलिए अर्ज़ करूँगा कि कुछ लिख कर भेजो. और तय करने दो कागजों को रिश्तों का सफ़र .तुम्हारे ख़त के इंतज़ार में......
अज़ीज़.
"सुमति यह तुम्हारा लिखा हुआ ख़त है......ज्यों का त्यों ..देखो मैने कैसा सहेज कर रखा है......
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