Friday, January 15, 2010

Kab ke bichhde...

एक ख़त तुम्हारे नाम. सुमति.यार जब तुम  लिखते हो तुम पर बड़ा प्यार आता है. यह बूँद बूँद कर के प्यास मत बुझाया करो   ...दरिया उड़ेल दो....पर ध्यान रखना ..सुना है कि अगर कोई बहुत दिनों का प्यासा हो तो उसकी प्यास भी तड़पा तड़पा कर के ही बुझानी चाहिए...ऐसा है क्या? पर मैं क्या करूँ..मैं तो पूरा दरिया ही हलक में उतारना चाहता हूँ. मय कि तुमको ज़रूरत नहीं पड़ती और हम हैं कि मयखाने में ही अपनी मय्यत का इंतज़ाम देखना चाहते हैं.सुन यार देख....यह नशा जो है न कुछ पलों के लिए ही सही मुझे तुझसे मिला तो देता है न...फिर मैं इसे बुरा कैसे कह सकता हूँ. मेरी जान...तुझे याद है जब हम दोनों वक़्त के हिचकोलों पर सवार थे और एक ही स्टेशन पर उतरना चाह था..पर तू पहले उतर गया और मैं बाद में गाडी छोड़ पाया...और तब के छूते तो अब तक सफ़र तमाम कर रहे हैं. क्या बेकारी के दिन अच्छे थे? पता नहीं सच सच नहीं कह सकता. रोटी बाकि सब बातों पर इतनी भारी  पड़ गयी है कि और कुछ देखना नहीं चाहता.फिर अब मेरे दिल में भी तो न जाने कौन कौन मर्ज़ी या बेमर्ज़ी के घर कर गया है न? अब ख्याल तो रखना ही पड़ेगा न. मेहमान जो ठहरे .अच्छा सुन....
बंद कर के कभी आँखों को ख्वाब देखा है?
वो रंग स्याह है या सुर्ख कभी देखा है?
कि वक़्त पानियों पे अक्स जो बनाता है..
उसे उतार के काग़ज़ पे कभी देखा है?

कभी देखना ..पता चलेगा कि वक़्त ने काग़ज़ के साथ क्या किया है?

पतंग बन के हवाओं के घर गए हो कभी?
ख्याल बन के मेरी सोच में ढले हो कभी?
कि तुमको याद कभी आती है वो फांकाकशी?
किसी कि हसरतों के वास्ते रुके हो कभी?

कैसे रुकोगो? रुक जाने का नाम तो ज़िन्दगी नहीं है न? पर...

हम अगर थाम ले बाहें कभी और यूँ पूछे...
बताओ आज ...हमें कितना प्यार करते हो?
रुकोगो , सांस भर के सोचोगे  ..
और कहोगे कि कैसा सवाल पूछा है?

ऐसा कई बार होता है जब हम यह सोच कर कुछ नहीं कहते कि कहना क्या है...तुम्हे तो पता ही है न? कैसे पता होगा? अब तू तुम्हारी परछाईं भी मेरे साथ नहीं चलती...कमबख्त ने तुम्हारा बाजु थाम लिया है...
मिलते रहो.. बिखरते रहो और मुझ पर यूँ ही बरसते रहो....

2 comments:

sumati said...

nglaयूँ तो हर पल इन्हें भिंगोना ठीक नहीं .
लेकिन आँख का बंजर होना ठीक नहीं .
वाशिंदे इस बस्ती के सब भोले हैं .
इन पर कोई जादू टोना ठीक नहीं.
मुख्तारी तो वैसे भी दिख जाती है
आँगन मैं बन्दुन्कें बोना ठीक नहीं .
दिए जैसी रोशन तेरी (sameer) आँखें है
फसले-आब का इनमें बोना ठीक नहीं

उस दौर मैं भी तुम्हें हँसते खिलखिला ते मैंने देखा .
.हम मायूस हों तो हों ..तुम बिंदास ही अछे लगते
हो
खुदा तुम्हारी कातिलाना हंसी को लाख उम्र दे
.............शबा खैर दोस्त

toshi said...

best post till now...i liked that "ek hi station pe..." vy well described ...