Friday, October 1, 2010

KAHO RAAM

कहो राम....
तुमको अपनी सफाई में कुछ कहना है? न्यायालय एक एक कोने में सर झुकाए खड़े दशरथ नंदन राम से एक जज ने पूछा. राम चुप रहे. देखो राम तुम्हारी ख़ामोशी को तुम्हारा इकबाल ए जुर्म माना जा सकता है. तुम्हारे खिलाफ गंभीर आरोप हैं जो किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारे अपने ही देश के लोगों ने लगाये हैं. राम कि आँखों के कोने भीग गए. पैर के नाख़ून से फर्श को कुरेदते हुए राम बेबस से खड़े रहे. आज उनके साथ कोई खड़ा नहीं दिख रहा है. कोई उनके साथ १४ सेकंड का भी बनवास भोगने को तैयार नहीं है. राम क्या तुम ५ साल के लिए राज गद्दी दिला सकते हो ? बोलो ? जज ने फिर पूछा.
राम पर आरोप है कि उन्होंने अपने लिए अपनी ही जन्म भूमि में जगह मांगने का साहस किया. देश का ६० साल बर्बाद किया. २ लाख सिपाहिओं को बेवजह परेशान किया. क्यों....क्यों किया राम? क्या लोगों कि आस्था में तुम्हारा स्थान कम हो गया था या फिर तुम्हे भी अपने लिए प्रोपर्टी चाहिए? क्या हर एक हृदय में जहां तुम सालों से रहते आये हो ....घुटन होने लगी ?
राम कैसे कहे...जहां तो उन्होंने तब भी नहीं जब पित्र चरण ने उन्हें वनवास दिया....कहा तो तब भी नहीं जब समुद्र ने उन्हें स्थान नहीं दिया....और कहा तो तब भी नहीं जब लोक चार ने सीता कि अग्नि परीक्षा मांगी. राम तुम्हारे न बोलने के कारण देखो कितने सारे लोग राम बन कर बोल रहे हैं.आज अगर तुम नहीं बोले तो .......सरयू भी अपना जल समेट कर पाताल गामिनी हो जाएगी....सीता रसोई का चूल्हा सदा सदा के लिए ठंडा पड़ जाएगा...राम चबूतरा दरक जाएगा....और फट जाएगा हनुमान का सीना जहां से इस बार तुम्हारी छवि नहीं केवल और केवल रक्त बहेगा....
राम ने गहरी श्वाश ली....अपने चारो तरफ देखा.....११५ करोड़ की अदालत के बाहर खड़ी भीड़ में अपने लिए ११५ भक्त खोजने की निरर्थक चेष्टा की.....और फिर धनुर्धारी राम ने जिनका धनुष धारा १४४लागू होने  के कारन थानेदार ने जमा करा लिया था........और कहा...
मैं शुन्य ने उपजा हुआ साकार ब्रह्मा हूँ. मैं ॐ से ओम्कारित स्पंद हूँ....मैं शाश्वत हूँ...चिरंतन हूँ...मैं श्रेष्ठ हूँ..पूज्य हूँ...और मेरा पता अयोध्या है...वही अयोध्या जज साहब जहां कभी युद्ध नहीं होता. अब भी नहीं होगा....और कभी नहीं होगा....
अवध पुरी की वीथिकाओं में ........इसका मतलब गली होता है.....जज साहब ने बयान लिखने वाले क्लार्क को टोका...हाँ राम आगे बोलो...
जहां मेरा बचपन बीता कभी लगा ही नहीं की मैं अयोध्या के किसी एक कोने में पैदा हुआ था....सारी अयोध्या मेरा पालना थी....सरयू मेरा सिरहाना थी , अयोध्या की हर  माँ मेरी माँ थी, हर घर मेरा राज महल था हर होर मेरा सखा थे...जज साहब मैं अयोध्या में नहीं अयोध्या मुझमे रहती थी...अब अयोध्या मेरा दंड कारान्य हो गयी है........सरयू में पांव धोने जाता हूँ..तो धारा पीछे चली जाती है.....और अगर मैं फिर भी नहीं मानता तो पानी लाल हो जाता है....अपने बदन को देखता हूँ...रावण के दिए हुए घावों से फिर से रक्त रिसने लगता है....मेरा कौशेय विदीर्ण हो गया है...मेरी पादुकाएं मेरे मंदिर के बाहर से कोई चुरा ले गया है....और मेरा धनुष अब मुझसे उठाया नहीं जाता.. यह मेरी अयोध्या नहीं लगती जज साहब...यह मेरी अयोध्या नहीं है...नहीं है....मुझे नहीं चाहिए जमीन....मुझ पर लगाया गया इलज़ाम झूठा है...
हो सकता है राम ....तुम सच कह रहे हो.....जज ने कहा....पर तुम्हारे पक्ष में सारे सबूत हैं...और तुम चाहो या न चाहो यह अदालत हुकम देती है कि दशरथ नंदन राम को जहां पर वह विराजमान हैं उसी जगह पर आजीवन बनवास भोगना पड़ेगा....
पक्षकार चाहे तो राम के बनवास कि जगह घटाने या बढाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.....पर राम..........आप कहीं नहीं जा सकते....
आदेश कि ५०० प्रतिया मीडिया में बाँट दी जाए और इसे इंटर नेट पर भी अपलोड कर दिया जाए.
हे राम

2 comments:

sumati said...

mere dost tum har bar ki tarha kamal karte ho we can make it a aikanki natak such a pictoral presentation .be regular ... again badhai..

ram ram

sumati

Sameer Verma said...

thank you. trying to be regular. but tumhare jaisa fertile brain nahin hain.