Friday, March 5, 2010

उन्वान फ़साने का नहीं मिलता है...
कुछ लुत्फ़ ज़माने का नहीं मिलता है..
क्या दोस्त को रोयें कि जहां में अब तो
दुश्मन भी ठिकाने का नहीं मिलता है .

बिगड़ कुछ न सका कोई मेरा जीते जी
सभी को ही मेरे मरने का इंतज़ार रहा
भला रकीब मेरी ज़िन्दगी में क्या करते
मैं जब मरा भी तो दो चार पर सवार रहा .

प्यार का एक नया कानून बनाया जाये
दुश्मनों को भी कलेजे से लगाया जाये
एक तरफ काबा और एक तरफ बुतखाना
बीच में दोनों के मयखाना बनाया जाए .


और अंत में...
हम अपने दर्द कि तौहीन कर गए होते
अगर शराब न होती तो मर गए होते..

2 comments:

toshi said...

waah waah ...aacha hai..
urdu + shudh hindi is a rare combination...

Sameer Verma said...

thanks dear. you also start writing some thing.