उन्वान फ़साने का नहीं मिलता है...
कुछ लुत्फ़ ज़माने का नहीं मिलता है..
क्या दोस्त को रोयें कि जहां में अब तो
दुश्मन भी ठिकाने का नहीं मिलता है .
बिगड़ कुछ न सका कोई मेरा जीते जी
सभी को ही मेरे मरने का इंतज़ार रहा
भला रकीब मेरी ज़िन्दगी में क्या करते
मैं जब मरा भी तो दो चार पर सवार रहा .
प्यार का एक नया कानून बनाया जाये
दुश्मनों को भी कलेजे से लगाया जाये
एक तरफ काबा और एक तरफ बुतखाना
बीच में दोनों के मयखाना बनाया जाए .
और अंत में...
हम अपने दर्द कि तौहीन कर गए होते
अगर शराब न होती तो मर गए होते..
2 comments:
waah waah ...aacha hai..
urdu + shudh hindi is a rare combination...
thanks dear. you also start writing some thing.
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